बेंगलूरु। भारतीय मंगल ऑर्बिटर मिशन, मंगलयान ने सोमवार को अपनी कक्षा में एक हजार पृथ्वी दिवस पूरे कर लिए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पांच नवम्बर २०१३ को इसका प्रक्षेपण किया था। २४ सितम्बर २०१४ को पहले ही प्रयास में इसे मंगल की कक्षा में स्थापित कर दिया गया था। भारत के मार्स आर्बिटर मिशन यानी मंगलयान अभियान ने अपने अंतरिक्ष में १००० दिन पूरे कर लिए हैं। भारत के इस मंगलयान मिशन से कई उपलब्धियां जु़डी हैं, जिसमें कम लागत और कम समय में सही डाटा भेजना शामिल है। इस उपग्रह ने मंगल की ३८८ कक्षाओं का चक्कर लगाया और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र, (इसरो) के अनुसार ये अभी भी सही हालत में है और आकांक्षाओं के अनुरूप काम कर रहा है। मार्स आरबिटर स्पेसक्राफ्ट से भेजे गए आंक़डों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा रहा है। मंगलयान से भेजे गए आंक़डों का अध्ययन करने के लिए इसरो भारत के अनुंसधानकर्ताओं को मौका देने की पहले ही घोषणा कर चुका है। मंगलयान के मार्स कलर कैमरे ने अब तक सात सौ पंद्रह चित्र भेजे हैं। इस अभियान में अब तक २० किलोग्राम प्रोपीलैंट का उपयोग हो चुका है और अभी १३ किलोग्राम बाकी है, जो इस अभियान के पूरा होने में काम आएगा।इसरो ने आज कहा कि मंगलयान का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा है। मंगलयान को छह माह तक काम करने के लिहाज से तैयार किया गया है लेकिन वह पिछले एक हजार दिन से अपनी कक्षा में चक्कर लगा रहा है। पृथ्वी के एक हजार दिन मंगल ग्रह के ९७३.२५ दिन के बराबर होते हैं। इस दौरान मंगलयान ने इस ग्रह के ३८८ चक्कर लगाये हैं। इसरो ने बताया कि २४ सितंबर २०१६ तक मंगलयान के रंगीन कैमरे ने ७१५ तस्वीरें भेजी हैं।

इसरो ने पांच नवंबर, 2013 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी रॉकेट के जरिये मंगलयान को नौ महीने लंबे सफर पर भेजा था और वह एक दिसंबर, 2013 को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर चला गया था।450 करोड़ रुपए की लागत वाले मिशन का उद्देश्य मंगल की सतह एवं उसकी खनिज संरचना का अध्ययन करना और मंगल के वायुमंडल में मिथेन गैस की मात्रा को मापना है। मिथेन गैस की मौजूदगी से जीवन की संभावनाओं का पता चलता है।