मुंबई। मुम्बई को दहलाने वाले १२ बम विस्फोटों के २४ वर्ष बाद यहां की एक विशेष अदालत ने मामले की सुनवाई के दूसरे हिस्से में शुक्रवार को छह व्यक्तियों को दोषी ठहराया और एक को बरी कर दिया। इन श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों में २५७ व्यक्तियों की मौत हो गई थी और ७०० अन्य घायल हो गए थे। देश पर हुए अब तक के सबसे भीषण आतंकवादी हमले के कई साजिशकर्ता एवं षड्यंत्रकर्ता अभी भी फरार हैं और उनके बारे में माना जाता है कि वे पाकिस्तान में हैं। इनमें सरगना दाऊद इब्राहिम, उसका दाहिना हाथ छोटा शकील, टाइगर मेमन आदि शामिल है। मामले में दोषी याकूब को २०१५ में नागपुर जेल में फांसी दे दी गई थी। सभी सातों आरोपियों ने आपराधिक साजिश, भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छे़डना और हत्या समेत कई आरोपों का सामना किया। वर्ष २००७ में पूरी हुई पहले चरण की सुनवाई में टाडा अदालत ने इस मामले में १०० लोगों को दोषी करार दिया था जबकि २३ लोगों को बरी कर दिया गया था। सात आरोपी अबू सलेम, मुस्तफा दोसा, करीमुल्लाह खान, फिरोज अब्दुल राशिद खान, रियाज सिद्दिकी, ताहिर मर्चेंट और अब्दुल कयूम के मौजूदा मुकदमे मुख्य मामले से अलग चले क्योंकि इन्हें मुख्य मुकदमे की सुनवाई खत्म होने के समय गिरफ्तार किया गया। इन घातक हमलों में २५७ लोग मारे गए, ७१३ लोग गंभीर रूप से घायल हुए और २७ करो़ड रुपए की संपत्ति नष्ट हुई थी। विशेष न्यायाधीश जीए सनाप ने रियाज सिद्दिकी के अलावा सभी अन्य पांचों दोषियों को टाडा, विस्फोटक अधिनियम, विस्फोटक सामग्री अधिनियम, हथियार कानून और सार्वजनिक संपत्ति विध्वंस रोकथाम कानून के तहत अपराधों के अलावा आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत हत्या, आपराधिक साजिश का दोषी ठहराया। सिद्दिकी को केवल अबू सलेम और अन्य की हथियारों को लाने में मदद करने के लिए टाडा के तहत दोषी पाया गया। बहरहाल, अदालत ने सातों आरोपियों को इस मामले में देश के खिलाफ युद्ध छे़डने के आरोप से मुक्त कर दिया।

अबू सलेम का वर्ष २००५ में पुर्तगाल से प्रत्यर्पण हुआ था। मामले में अबू सलेम को दोषी करार तो दे दिया गया है लेकिन उसे फांसी की सजा नहीं हो सकती क्योंकि पुर्तगाल से प्रत्यर्पण इसी शर्त पर हुआ था कि सलेम को मौत की सजा नहीं दी जाएगी। १३ अगस्त २०१३ को टाडा अदालत ने भारत और पुर्तगाल के बीच हुए एक प्रत्यर्पण संधि के तहत सीबीआई को सलेम के खिलाफ कुछ आरोप हटाने की इजाजत दी। २६ वर्षीय एक महिला से विवाह करने की उसकी एक अन्य अर्जी अदालत में लंबित है। वह १९९३ में हथियार, विस्फोटक आदि लेने के लिए एक अन्य फरार आरोपी के साथ गुजरात के भरूच गया। उसे भरूच से नौ एके ५६ राइफलें, १०० हथगोले और कुछ गोलियां मिलीं। उसने उन्हें एक मारूति वैन में छुपाकर मुम्बई पहुंचाया जो उसे कथित रूप से आरोपी रियाज सिद्दिकी ने दी थी। सलेम ने दो अन्य के साथ मिलकर कुछ हथियार एवं गोलियां १६ जनवरी १९९३ को बॉलीवुड अभिनेता संजय दा के आवास पर पहुंचाई और दो दिन बाद उसमें से कुछ वापस ले गया।

मामले में सुनवाई 2007 में ही शुरू हो गई थी लेकिन उच्चतम न्यायालय में लंबित तीन याचिकाओं के कारण इसमें देरी हुई। इसमें एक-एक याचिका दोसा तथा सलेम ने और अन्य याचिका सीबीआई ने दायर की थी। सुनवाई वर्ष 2012 में फिर शुरू हुई और इस वर्ष मार्च में पूरी हुई।

वर्ष 2013 में मुकदमे के दौरान उच्चतम न्यायालय ने सभी आरोपियों की एक अपील पर फैसला सुनाया जिसमें मुख्य साजिशकर्ता याकूब मेमन की मौत की सजा की पुष्टि की जबकि बम लगाने वाले अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। दया याचिका खारिज होने के बाद 30 जुलाई 2015 को याकूब मेमन को फांसी दे दी गई।

संजय दत्त और कई अन्य आरोपियों ने उच्चतम न्यायालय द्वारा उनकी सजा को बरकरार रखने के बाद मई 2013 में यहां टाडा अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया।