अतीत से सबक जरूरी

देश में 25 जून, 1975 को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया था

उस दौरान कई ज्यादतियां हुई थीं ... विपक्ष के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया था

लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के तुरंत बाद ओम बिरला ने आपातकाल की निंदा संबंधी जो प्रस्ताव पढ़ा और तत्कालीन सरकार की आलोचना की, उसमें ऐसा क्या है, जिसको लेकर किसी को हंगामा करना चाहिए या उसका विरोध करना चाहिए? आपातकाल इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक अप्रिय अध्याय है, जिस पर खुलकर बातें होनी चाहिएं। कोई व्यक्ति हो या देश, उसे अपने अतीत से हमेशा सीखते रहना चाहिए। अगर अतीत को याद रखने, उससे शिक्षा लेने की कोई जरूरत ही नहीं है तो इतिहास क्यों पढ़ाया जाता है? जिसे अतीत में ठोकर लगी, वह चोटिल हुआ, उसे दोबारा उठने और चलने के दौरान रास्ते को सावधानी से पार करना चाहिए। अगर एक बार ठोकर लगने के बाद यह सोचकर लापरवाही से चलता रहे कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा, तो इससे अगली ठोकर को टाला नहीं जा सकता। देश में 25 जून, 1975 को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया था, जिससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। उस दौरान कई ज्यादतियां हुई थीं। विपक्ष के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया था। विरोध करने वालों के खिलाफ खूब बलप्रयोग किया गया था। प्रेस की आज़ादी को दबाया गया था। ख़बरों पर कैंचियां चलाई गई थीं। अख़बारों में वह हिस्सा कोरा छपता था। जबरन नसबंदी के भी कई मामले सामने आए थे। गांवों में सरकारी गाड़ी को देखते ही लोग छिपने के लिए जगह ढूंढ़ते थे। आज की युवा पीढ़ी ने वह दौर नहीं देखा है। जिन्होंने देखा है, उनके अनुभव जानने चाहिएं। अब तो इंटरनेट पर ऐसी कई किताबें उपलब्ध हैं, जिनमें उस दौर के पत्रकारों, नेताओं, अधिकारियों और आम लोगों की आपबीती और आंखोंदेखी का जिक्र है। पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह सबकुछ तब हो रहा था, जब देश कहने को तो आज़ाद था, लेकिन देशवासियों की आज़ादी को कुचला जा रहा था।

हालांकि ऐसा नहीं है कि आपातकाल का सबने विरोध ही किया था। कथित बुद्धिजीवियों का एक छोटा-सा वर्ग उसके पक्ष में खड़ा था। वह तत्कालीन सरकार के उस फैसले से देश को होने वाले 'फायदे' गिनवा रहा था। ऐसे 'बुद्धिजीवियों' की बाद में चौतरफा निंदा हुई और उनके परिवारों, रिश्तेदारों और दोस्तों ने उन्हें खूब आड़े हाथों लिया था। बेशक तत्कालीन सरकार का वह फैसला गलत था। उससे लोगों की आज़ादी छीनी गई। उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ। आज किसी को भी उसके संबंध में न तो रक्षात्मक मुद्रा में आने की जरूरत है और न यह कहना चाहिए कि वह तो बहुत पुरानी बात हो गई, लिहाजा इस पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए! लोकतंत्र में इस बात की हमेशा गुंजाइश रहती है कि नेताओं / सरकारों के फैसलों की आलोचना कर सकें। अमेरिका के लोकतंत्र की कई जगह मिसाल दी जाती है, उसके नेताओं के योगदान को याद किया जाता है, लेकिन उनके फैसलों की आलोचना हमेशा होती रही है। अमेरिकी इतिहास के कई बड़े नेता, जो अपने दौर के मशहूर बुद्धिजीवी भी थे, की आज इसलिए आलोचना होती है, क्योंकि उन्होंने गुलामों को अधिकार देने का विरोध किया था। पश्चिमी देशों में ऐसे कई जहाजियों की हिम्मत और बहादुरी की वाहवाही की जाती है, जिन्होंने नए समुद्री रास्तों की खोज की थी, लेकिन उन्होंने अपने अधीनस्थों और अन्य देशों के निवासियों के साथ जो कठोर बर्ताव किया, उसकी आलोचना की जाती है। एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक, जिनके आविष्कारों ने दुनिया बदल दी, को (उनकी मृत्यु के 92 साल बाद) आज भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्होंने अपने एक साथी को उसकी मेहनत का श्रेय नहीं दिया था। आलोचना का अर्थ संबंधित व्यक्ति / संस्था / सरकार के योगदान को पूरी तरह नकार देना नहीं होता है। इसमें बेहतरी की संभावनाओं को ढूंढ़ने की कोशिश होती है। देश के विकास में इंदिरा गांधी के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उनके कई फैसले ऐसे थे, जिनसे भारत को फायदा हुआ, उसकी धाक बढ़ी। वर्ष 1971 के युद्ध में हमारी 'महाविजय' को कौन भूल सकता है? उसका श्रेय इंदिरा गांधी की दृढ़ इच्छाशक्ति को जरूर मिलना चाहिए। इसी तरह आपातकाल के संबंध में भी उनके और अन्य सहयोगियों के फैसलों की आलोचना की जा सकती है। नेताओं / सरकारों के फैसलों के हर पक्ष का विश्लेषण करने और उससे कुछ सीखने से ही बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।

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