बेंगलूरु/दक्षिण भारत। शहर के वीवी पुरम स्थित सिमंधर शांतिसूरी जैन श्वेतांबर संघ के तत्वावधान में मंगलवार काे उपस्थितजनाें काे संबाेधित करते हुए जैनाचार्य विमलसागरसूरीजी ने कहा कि जाे मानसिक हिंसा से बचने का प्रयत्न करता है, वही सच्चे अर्थ में साधक है। हिंसा दुःख, अभाव, बीमारी, गरीबी और रुकावटें लाती है।
हिंसा द्रव्यात्मक हाें या भावनात्मक, दाेनाें खतरनाक हैं। विचाराें की हिंसा ही जीवन व्यवहार में उतरती है। बाहर जाे हिंसा दिखाई देती है, उसका काेई न काेई अंश मनुष्य के भीतर जरूर हाेता है। हिंसा के परिणाम कभी सुखद नहीं हाेते। अहिंसा ही जीने का रास्ता है, हिंसा जीने का रास्ता नहीं है। अहिंसा की शुरुआत सबसे पहले अपने भाेजन से करनी चाहिए। अन्न के साथ मन का सीधा संबंध है।
जैसा अन्न हाेता है, वैसा ही मनुष्य का मन बनता है। शुद्ध आहार हमारे विचाराें काे भी शुद्ध रखता है। आहारचर्या के बाद आसपास का वातावरण, शिक्षा, संस्कार, दृश्य-श्राव्य माध्यम, मित्र-परिजन और धनाेपार्जन आदि अहिंसक जीवनशैली काे जीवंत रखने के लिए आवश्यक पूरक तत्व हैं।
इन सबके प्रयाेगात्मक रूप प्रतिदिन की जीवनचर्या में देखे जा सकते हैं। अहिंसा पूर्णरूपेण मनाेवैज्ञानिक तत्व है। इसमें सबकी सुख-शांति और उन्नति का संदेश है। मित्रता, प्रेम, भाईचारा, सहयाेग, साैहार्द और समन्वय, सबकी भूमिका अहिंसा पर ही टिकी है।
आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी ने कहा कि अहिंसा शुद्ध व सात्विक भावाें की गंगाेत्री है। अहिंसा से निष्पन्न विचार कभी किसी का अहित नहीं करते, बल्कि सबके हित का चिंतन करते हैं। सबके प्रति न्याय और सभी काे समान धरातल पर देखने का दृष्टिकाेण भी सिर्फ अहिंसा से ही संभव है, इसलिए अधिक से अधिक द्रव्यात्मक और भावनात्मक अहिंसा का परिपालन करना चाहिए।
अहिंसक मनुष्य किसी का भी शत्रु नहीं हाेता, वह प्राणीमात्र ताे मित्रवत देखता है। अहिंसा किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ती, उसमें निर्भय का वरदान है। विश्वशांति केवल अहिंसा के रास्ते से ही संभव है। हिंसा का मार्ग ताे समग्र पृथ्वी काे नष्ट कर देगा। इससे पूर्व विजयनगर से पदयात्रा करते हुए आचार्य विमलसागर सूरीश्वरजी, गणि पद्मविमलसागरजी और सहवर्ती श्रमणजन वीवी पुरम पहुंचे, जहां उनकर भावपूर्ण स्वागत हुआ।