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अब्दुलरजाक गुरनाह: उपनिवेशवाद के दंश की पीड़ा को स्वर देने वाला संवेदनशील अफ्रीकी लेखक
गुरनाह का जन्म 20 दिसंबर 1948 को जंजाबीर में हुआ, जो अब तंजानिया में है
 
इंग्लैंड में एक शरणार्थी के रूप में उन्होंने 21 वर्ष की आयु से लेखन प्रारंभ कर दिया और लेखन की भाषा बनायी अंग्रेजी जबकि उनकी मातृभाषा स्वाहिली थी।

नई दिल्ली/भाषा। उपनिवेशवाद भले ही कुछ खास कालखंड तक सीमित रहता हो लेकिन उसके दंश की स्मृतियों को समाज लंबे समय तक संजोये रखता है और इस वर्ष जिस अश्वेत लेखक अब्दुलरजाक गुरनाह को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है, दरअसल उनका रचनात्मक संसार भी उन्हीं स्मृतियों की संवेदनशीलता को मुखरता देता है।

सात अक्तूबर को जब किसी ने गुरनाह को यह बताया कि उन्हें इस साल के साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया तो उनके मन में सबसे पहले जो बात आयी, वह थी कि यह स्वांग या मजाक है। लेकिन यह एक सत्य है। विश्व भर के साहित्य के लिए 2021 का सबसे बड़ा सत्य।

गुरनाह का जन्म 20 दिसंबर 1948 को जंजाबीर में हुआ, जो अब तंजानिया में है। जंजाबीर में 1960 के दशक एक क्रांति हुई, जिसमें अरब मूल के लोगों का उत्पीड़न किया गया। उन हालात में 18 वर्षीय गुरनाह को विवशता में विस्थापित होकर ब्रिटेन में आना पड़ा।

इंग्लैंड में एक शरणार्थी के रूप में उन्होंने 21 वर्ष की आयु से लेखन प्रारंभ कर दिया और लेखन की भाषा बनायी अंग्रेजी जबकि उनकी मातृभाषा स्वाहिली थी। गुरनाह के साहित्य संसार में विस्थापन की पीड़ाओं को बखूबी महसूस किया जा सकता है।

गुरनाह का पहला उपन्यास ‘मैमोरी ऑफ डिपार्चर’ 1987 में प्रकाशित हुआ। गुरनाह के लिए लेखन के क्या मायने हैं, इसे उनके शब्दों में बेहतर तरीके से समझा जा सकता है, ‘मेरे लिए लेखन के समूचे अनुभव को जो चीज प्ररित करती है, वह है विश्व में आपकी जगह खोने का विचार।’

गुरनाह ने कहा कि उन्होंने अपने लेखन में विस्थापन तथा प्रवासन के जिन विषयों को खंगाला, वे हर रोज सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि वह 1960 के दशक में विस्थापित होकर ब्रिटेन आये थे और आज यह चीज पहले से ज्यादा दिखाई देती है।

उन्होंने कहा, ‘दुनियाभर में लोग मर रहे हैं, घायल हो रहे हैं। हमें इन मुद्दों से अत्यंत करुणा के साथ निपटना चाहिए।’

गुरनाह के उपन्यास ‘पैराडाइज’ को 1994 में बुकर पुरस्कार के लिए चयनित किया गया था। उन्होंने कुल 10 उपन्यास लिखे हैं।

साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले गुरनाह पांचवें अफ्रीकी लेखक बन गये हैं। इससे पहले नाइजीरियाई लेखक वोले सोयिन्का, मिस्र के नगीब महफूज, दक्षिण अफ्रीका की नादिन गार्डिमेर और जान एम कोट्जी को यह सम्मान मिल चुका है।

सत्तर वर्षीय गुरनाह ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ केंट में उत्तर-उपनिवेशकाल के साहित्य के प्रोफेसर के रूप में सेवाएं देते हाल में सेवानिवृत्त हुए।
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