सुविधा बन रही समस्या

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay

विभिन्न धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर या ध्वनि विस्तारक यंत्रों के उपयोग पर फिर बहस छिड़ गई है। पिछले दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव ने यह कहते हुए शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके घर के पास स्थित मस्जिद से लाउडस्पीकर पर अज़ान की तेज आवाज आती है, जिससे हर सुबह उनकी नींद बाधित होती है। नींद पूरी नहीं होने से दिनभर सिरदर्द होता है।

इसके बाद यह सवाल चर्चा में है कि धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर का उपयोग होना चाहिए या नहीं, अगर हां तो कब और किस हद तक? साल 2017 में बॉलीवुड गायक सोनू निगम भी ट्वीट कर ऐसी ही शिकायत कर चुके हैं, जिस पर खूब हंगामा हुआ था।

धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर के औचित्य पर विचार करने से पहले हमें दो बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। क्या लाउडस्पीकर किसी भी धर्म की प्रार्थनाओं या परंपराओं का अनिवार्य अंग है? अगर लाउडस्पीकर का उपयोग जरूरी हो, तब इसका तरीका क्या हो; क्या इस स्थिति में किसी दूसरे विकल्प पर विचार किया जा सकता है? चूंकि लाउडस्पीकर किसी भी धर्म की प्रार्थनाओं या परंपराओं का अनिवार्य अंग नहीं है। धार्मिक स्थलों पर इसके उपयोग का इतिहास सौ साल पुराना भी नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि तब सभी स्थलों पर प्रार्थनाएं इसके बिना ही होती थीं।

वास्तव में लाउडस्पीकर एक सुविधा है, धार्मिक अनिवार्यता नहीं है। अगर इस यंत्र का उपयोग ऐसे तरीके से किया जाए जिससे दूसरे के लिए कोई समस्या उत्पन्न नहीं हो, तो यह प्रशंसनीय है। इसके जरिए अपना संदेश अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है, परंतु जब लाउडस्पीकर का उपयोग इस कदर हो कि उससे दूसरों को समस्याएं होने लगें, तो इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। उस स्थिति में यह सुविधा ही समस्या बन जाती है।

इस संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश स्पष्ट है, जिसमें कहा गया है कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी धार्मिक स्थल अथवा सार्वजनिक स्थल पर लाउडस्पीकर या लोक संबोधन प्रणाली का उपयोग किया जाना प्रतिबंधित है। हालांकि, इस आदेश का पालन कितना हो रहा है, यह विचारणीय है। उच्च न्यायालय ने मई 2020 में दिए इस आदेश में लाउडस्पीकर या ऐसे उपकरण जिनसे आवाज बढ़ाई जा सकती है, को धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना है।

किसने सोचा था कि विज्ञान की यह खोज ही एक दिन कई लोगों के लिए मुसीबत बन जाएगी! लाउडस्पीकर के उपयोग पर विशेष समयावधि में प्रतिबंध और उसके बाद सीमित उपयोग की अनुमति किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है। ऐसा हर धार्मिक स्थल पर होना चाहिए। बल्कि धार्मिक स्थलों के प्रबंधकों को आगे आकर एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए कि वे समाज के अन्य लोगों की सुविधा को लेकर कितने सजग हैं। जब दिन में लोग सामान्यत: अपने कामकाज में जुटे हों, तो लाउडस्पीकर का सीमित उपयोग किया जा सकता है। उस समय भी ध्यान रखना चाहिए कि आवाज ज्यादा न हो।

अगर आसपास अस्पताल, चिड़ियाघर आदि हो तो लाउडस्पीकर के उपयोग से बचा जाए। देर रात या अलसुबह जब लोगों की नींद बाधित होने का अंदेशा हो, तो लाउडस्पीकर का उपयोग बिल्कुल नहीं हो। उस समय सूचना के लिए एसएमएस, वॉट्सऐप, टेलीग्राम और इंटरनेट के जरिए प्रसारण पर विचार किया जा सकता है। आज हमारे पास विज्ञान द्वारा उपलब्ध कराए गए ऐसे कई विकल्प हैं, जिन्हें आजमाएं तो लाउडस्पीकर से किसी को समस्या ही नहीं होगी।