गृहिणी.. सांकेतिक चित्र
गृहिणी.. सांकेतिक चित्र

श्रीकांत पाराशर
समूह संपादक,
दक्षिण भारत राष्ट्रमत

बेंगलूरु। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने उद्बोधन में देश को आत्मनिर्भरता की ओर बढने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था कि अचानक विश्वभर में कोरोना संकट ने जिस तरह से अपना तांडव मचाया और भारत में भी जो स्थितियां बनीं उनसे यही सीख मिलती है कि अब हमें, यानी भारतीयों को आत्मनिर्भर बनना होगा। हालांकि उनका यह कथन काफी गहराई लिए हुए होगा। इसके वैश्विक स्तर पर अपने अलग मायने होंगे परंतु भारत में भी लोग अपने अपने विवेक से इसका अर्थ निकाल रहे हैं। महिलाओं ने तो मोदी के कथन को बहुत गंभीरता से लिया है।

* कोरोना में कोल्हू का बैल बनीं गृहिणियां
कोरोना के कारण जब लाकडाउन हुआ तो महिलाओं की तो बन आई। कोल्हू के बैल की तरह उन्हें काम करना पड़ा। आजकल महिलाओं को घरेलू कामकाज करने की आदत तो है नहीं। बर्तन मांजना, कपड़े धोना, पोंछा लगाना, झाड़ाबुहारी करना उनके वश की बात नहीं रह गई है। इसके कई कारण हैं। अभी जो नई पीढी शादी होकर ससुराल जा रही है, उसके लिए तो ये सारे काम किसी दूसरे लोक के काम जैसे हैं। उन्हें यह काम करने पड़ सकते हैं, वे स्वप्न में भी नहीं सोचती हैं। इस पीढी की लड़कियों को यह सब करने का सामान्य तजुर्बा भी नहीं होता है।

कारण, एक तो मध्यम और उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों की समृद्धि में गत कुछ दशकों में काफी इजाफा हुआ है इसलिए लड़कियों को बचपन से ही अपनी मां के घरेलू कामकाज में हाथ नहीं बंटाना पड़ता है क्योंकि मां को खुद को ही यह सब काम नहीं करने पड़ते हैं। घर का ऐसा सारा कामकाज हाउस मेड (घरेलू नौकरानी) के जिम्मे होता है। पहले उसे बर्तन मांजने के लिए रखा जाता है, फिर धीरे धीरे मेड का काम एक एक कर बढता जाता है और महिलाओं का घटता जाता है। जल्दी ही घर का सारा काम हाउस मेड करने लगती है और गृहिणी का काम खाना बनाने तक सीमित रह जाता है। कुछ और ज्यादा धनाढ्य परिवारों में तो रोटी- सब्जी भी नौकरानी ही बनाती है। महिलाओं के पास केवल शापिंग की जिम्मेदारी बचती है। थोड़ा समय बचता है तो मोबाइल पर सोशल रिश्तेदारी निभाई जाती है। सहेलियों, रिश्तेदारों से बातचीत कर रिश्तों को मजबूत बनाया जाता है।

* अब काम करने की आदत नहीं महिलाओं को
पहले लड़कियां पढाई के बाद अपनी मां के काम में हाथ बंटाती थीं तो खाना बनाने समेत घर के लगभग सभी छोटे बड़े काम अनायास ही सीख जाती थीं। अब लड़कियां पढती हैं तो घर का काम नहीं करतीं। कुछ लड़कियां उच्च शिक्षा ग्रहण करती हैं तो उनके पास न तो समय होता है और न ही उनसे अपेक्षा होती है कि वे घर का कामकाज करेंगी। दोनों ही पक्ष उसी हिसाब से घर बार देखकर संबंध करते हैं। लड़की वाले समृद्ध परिवार देखते हैं ताकि लड़की को काम न करना पड़े और लड़के वाले भी पढी लिखी लड़की देखते हैं ताकि घर का काम न करे तो न सही, जाब करके कुछ कमाकर तो लाए। इसलिए आजकल शादी-ब्याह में घरेलू कामकाज आना कोई क्राइटीरिया नहीं रहा।

पहले के जमाने में तो लड़की देखने के लिए आने वाले लड़के पक्ष के लोग उसके खाना बनाने और अन्य काम आने के बारे में ही पूछताछ करते थे। अब वह दौर जा चुका है। अब तो लड़की खास पढीलिखी नहीं हो तब भी वह ससुराल में आकर कामकाज करेगी, इसकी अपेक्षा कोई नासमझ ही करता होगा। अब वह माहौल ही नहीं रहा। गलती से अगर किसी ने, कामकाज आता है या नहीं, यह पूछ लिया तो उसे तपाक से जवाब मिलता है कि आप लड़के के लिए पत्नी ढूंढ रहे हैं कि काम वाली बाई? कुछ हद तक बात भी सही है। कुछ प्रतिशत घरों को छोड़ देते हैं जहां वर्तमान महिला पीढी घरेलू कामकाज करती है। इनका पूरा दिन झाड़ाबुहारी, कपड़े धोने, बर्तन मांजने और खाना बनाने में ही लग जाता है। बाकी आज के समय में ऐसे घर कम ही हैं।

अब न तो परिवारों में लड़कियों को घरेलू कामकाज सिखाया जाता है ताकि वह ससुराल में जाकर कोई काम करे और न ही यह आशा की जाती है कि घर में जो लड़की बहू बनकर आएगी वह कोई काम करेगी। इसलिए इस मामले में कोई किसी को कोसता नहीं है।

* मजबूरी में पिस गई महिलाएं
यह श्रेय तो कोरोना को ही देना होगा कि उसके कारण जो लाकडाउन हुआ उसमें न चाहकर भी घरेलू नोकरानियों को पूरी तरह से छुट्टी देनी पड़ी और गृहिणियों को घरेलू काम करने पड़े। अगर मामला कोरोना का न होता तो महिलाएं किसी भी हालत में हाउसमेड की सेवा लेने से वंचित नहीं होतीं। हाउसमेड को खुश रखने के लिए महिलाएं क्या क्या नहीं करती हैं। उसकी निर्धारित तनख्वाह के अतिरिक्त थोड़ा बहुत अलग से भी समय समय पर दे देती हैं। उसे जब चाहे एडवांस देती हैं। छुट्टी के पैसे काटने का तो सवाल ही नहीं उठता। चाय नाश्ता भी मेड को राजी रखने के हथियारों में शामिल है।

कहने का तात्पर्य यह है कि महिलाओं के लिए मेड इतनी महत्वपूर्ण है कि एक बार वे सास या पति की बात को नजरअंदाज कर सकती हैं परंतु हाउसमेड की बात को तवज्जो देनी ही पड़ती है। ऐसी महत्वपूर्ण सेविका से भी कोरोना ने बिछुड़वा दिया। मेरी कई महिलाओं से बात हुई। उन्होंने कहा, ऐसे दिन तो उनको कभी देखने ही नहीं पड़े। एक तो लाकडाउन में हाउसमेड का न होना, ऊपर से घर में पुरुषवर्ग का दिनभर सोफा तोड़ना और ठाले बैठे पुरुषों और बच्चों द्वारा तरह तरह के पकवान बनाने की फरमाइश करना, किसी अन्याय से कम तो नहीं है। अनेक महिलाओं का तो वजन भी दो महिने में घटकर आधा रह गया होगा जबकि उन्होंने पहले भी इसके लिए लाख कोशिशें की होंगी, परंतु आधा किलो वजन घटाना भी संभव नहीं हुआ होगा।
इन महिलाओं को इन दो महीने में इतना घरेलू कामकाज करना पड़ा जितना उन्होंने ससुराल आकर कई वर्षों में भी नहीं किया होगा। इसमें भी, लाकडाउन में तो इस बार पति ने भी हाथ बंटाया क्योंकि पहली बार उसे भी पता लगा कि घर में महिलाओं के जिम्मे कितना काम होता है।

* कुछ हद तक बनेंगी आत्मनिर्भर
अब महिलाओं को लग रहा है कि अगर वे घरेलू कामकाज के लिए हाउसमेड पर निर्भर न होतीं और काम का अभ्यास बनाए रखतीं तो उन्हें लाकडाउन पीरियड में काम करने में उतना पसीना नहीं आता जितना उन्हें इन अचानक बने हालात में बहाना पड़ा। मोदी की आत्मनिर्भरता वाली सलाह को वे अब शायद गंभीरता से लेंगी और अपना काम कुछ हद तक खुद करेंगी। अधिक से अधिक आत्मनिर्भर बनेंगी। अब उन्हें महसूस हो रहा है कि कोरोना जैसे संकट की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी परंतु उससे बने हालात से जूझना पड़ा वैसे ही फिर कभी कोई संकट आए तो स्वयं को उससे निपटने में सक्षम तो होना पड़ेगा। महिलाओं के लिए फिलहाल यही आत्मनिर्भरता का संदेश है।