उच्च न्यायालय ने परमबीर से पूछा: देशमुख के खिलाफ पुलिस में शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई?

प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay

मुंबई/दक्षिण भारत। मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह द्वारा बंबई उच्च न्यायालय में राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ दायर गंभीर आरोपों वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए कुछ सवाल किए।

न्यायालय ने परमबीर से पूछा कि जब उन्हें यह पता था कि अनिल देशमुख कथित रूप से गलत कार्य कर रहे हैं, तो उन्होंने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई। बता दें कि परमबीर ​सिंह ने यह दावा किया है कि देशमुख ने निलंबित पुलिस अधिकारी सचिन वाजे को हर महीने 100 करोड़ रुपए की वसूली का लक्ष्य दे रखा था। वहीं, मंत्री देशमुख ने आरोपों को खारिज किया है।

परमबीर सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश जीएस कुलकर्णी की खंडपीठ ने पूछा, ‘आपने पहले पुलिस में शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई?’

इस दौरान खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बिना एफआईआर उच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता या सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी को जांच का निर्देश नहीं दे सकता है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने परमबीर सिंह से कहा, ‘आप एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं। आप साधारण आदमी नहीं हैं। गलत काम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना आपकी जिम्मेदारी थी। यह जानने के बावजूद कि आपके ‘बॉस’ द्वारा अपराध किया जा रहा है, आप चुप रहे।’

न्यायालय ने कहा, ‘कार्रवाई का उचित तरीका आपके लिए पहले पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराना होगा। यदि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है, तो आपके पास मजिस्ट्रेट के सामने एक आवेदन दाखिल करने का विकल्प है।’ पीठ ने साफ किया कि वह उच्च न्यायालय को मजिस्ट्रेट अदालत में नहीं बदल सकती।

दूसरी ओर, परमबीर सिंह की ओर से पेश हुए वकील विक्रम नानकानी ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल इस ‘चक्रव्यूह’ से बचना चाहते थे। इस पर पीठ ने पूछा, ‘क्या यह कह रहे हैं कि आप कानून से ऊपर हैं?’ चूंकि यह कानून में निर्धारित प्रक्रिया है।

हालांकि इस पर नानकानी का तर्क था कि उनके पास इस कदम के अलावा और कोई विकल्प नहीं था, आरोप ‘राज्य प्रशासन के प्रमुख’ के खिलाफ थे। पीठ ने कहा कि ‘हमारी प्रथम दृष्टया राय यह है कि एफआईआर के बिना यह अदालत जांच का आदेश नहीं दे सकती है।’

न्यायालय में महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोनी ने अनुरोध किया कि यह याचिका खारिज कर दी जाए। उन्होंने दावा किया कि यह व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना के साथ दायर की गई है।