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संपादकीय: याद आ रहे भगवान
 
संपादकीय: याद आ रहे भगवान
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता! कभी सार्वजनिक रूप से मंदिरों की छाया तक से भयभीत होने वाले नेताओं को इन दिनों भगवान याद आ रहे हैं। जो ममता दीदी राम के नाम से आगबबूला हो जाती थीं, अब वे अपना गोत्र बता रही हैं। भारतीय राजनीति में यह कैसा परिवर्तन है कि अब राजनेता यह बताने पर गर्व महसूस करते हैं कि वे शिवभक्त, जनेऊधारी और चंडीपाठ करने वाले, हनुमानजी में अटूट श्रद्धा रखने वाले लोग हैं? कुछ साल पहले तक तुष्टिकरण के सहारे ही चुनावी नैया पार कर लेने वाले नेताओं के लिए अब एक-एक वोट हासिल करना टेढ़ी खीर हो गया है।

कभी एक पूर्व प्रधानमंत्री को तत्कालीन राष्ट्रपति के सोमनाथ मंदिर जाने से सेकुलरिज्म खतरे में जान पड़ता था, अब उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता सोमनाथ में खुशी-खुशी शीश नवाते हैं। वर्षों तक सेकुलरिज्म का अर्थ सर्वधर्म समभाव न होकर तुष्टिकरण को बढ़ावा देना ज्यादा रहा। नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय जरूर देना होगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद अब अन्य पार्टियों के नेता मंदिरों में जाने, तिलक लगवाने, पूजन करने से नहीं हिचकते।

ऐसा नहीं है कि मोदी ने उन्हें इसके लिए हुक्म देकर मजबूर कर दिया। यह समाज में आई आध्यात्मिक, सांस्कृति चेतना का असर है जिसने उन नेताओं को भी मंदिरों के द्वार पर लाकर खड़ा कर दिया ​जो पार्टी विचारधारा की हां में हां मिलाते हुए धर्म को अफीम की संज्ञा देते थे। काशी विश्वनाथ हों या पशुपतिनाथ, मोदी हर जगह भक्ति के रंग में रंगे नजर आए और यह कहने से कभी नहीं हिचके कि हां, मैं हिंदू हूं। मेरा धर्म मुझे संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानने का मंत्र देता है।

साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी केदारनाथ स्थित जिस गुफा में ध्यानमग्न थे, आज वह उन्हीं के नाम से जानी जाती है। जब जनता ने अपने प्रधानमंत्री को इस रूप में देखा तो यह महसूस किया कि इनसे पहले वालों को हिचक क्यों होती थी? क्या वोटबैंक खोने का डर था? वोटबैंक की इस राजनीति ने देश का बड़ा नुकसान किया है। इससे किसी समाज को लाभ नहीं होता, बल्कि दीर्घकाल में हानि होती है। देश में सेकुलरिज्म की मनमानी परिभाषाएं गढ़ दी गईं।

आम जनता इसी बात को लेकर घुटन महसूस करती थी कि इनमें से कोई नेता मेरी बात क्यों नहीं कहता, वह मुझ जैसा बनने में क्यों हिचकता है? भारत को सेकुलरिज्म की परिभाषा जानने के लिए यूरोपीय, अमेरिकी या चीनी सत्ताधीशों के विचारों से ओतप्रोत शब्दकोशों की आवश्यकता नहीं है। यहां सेकुलरिज्म का अर्थ सर्वधर्म समभाव होना चाहिए। यही हमारा प्राचीन दर्शन है, लेकिन राजनेताओं को जब से नकली सेकुलरिज्म का रोग लगा है, इससे पूरे तंत्र में कई खराबियां पैदा हो गई हैं।

पिछले पांच-छह वर्षों को ही देखें तो धर्म के नाम पर रोटियां सेकने वाले उन ठेकेदारों की दुकानें बंद होती नजर आ रही हैं जो चुनाव से पहले ऐलान करते थे कि ‘हमारा वोट फलां पार्टी के नेताजी को है, सो हर कोई ध्यान रखे।’ अब मुकाबला कड़ा हो गया है। कभी केंद्र में एकछत्र राज करने वाले, एसी में रहकर अंग्रेजी में बतियाने वाले आज गांव-देहात के मंदिरों में भी आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं। अगर सामाजिक चेतना और एकजुटता से यह बदलाव देखने में आ रहा है, तो ऐसा बदलाव अच्छा है। इस चेतना को समाज कायम रखे, अपनी पहचान को लेकर जागरूक रहे। अपने प्राचीन ऋषियों पर गर्व करे, अपने देश पर गर्व करे। हमारे लिए आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना का आशय प्रत्येक की आस्था और अस्तित्व का सम्मान करना है, किसी का तुष्टिकरण या भय का संचार करना नहीं है।