आचार्य भिक्षु का जीवन निर्लोभी व निराभिमानी था : साध्वी विद्यावती

बेंगलूरु। यहां गांधीनगर स्थित तेरापंथ भवन में आचार्यश्री भिक्षुजी का २१५वां चरमोत्सव त्याग व तपस्या द्वारा साध्वीश्री विद्यावतीजी के सान्निध्य में मनाया गया। इस मौके पर साध्वीश्री ने आचार्यश्री भिक्षु के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन निर्लोभी व निराभिमानी था। सम्मान एवं अपमान दोनों में तटस्थ रहने वाले आचार्यश्री ने सदा सत्य का अनुसरण किया। भिक्षुजी ने क्रांतिदूत बनकर क्रांति के बीजों का रोपण किया। आज वे ही क्रांति के बीज वटवृक्ष के रुप परिलक्षित हो रहे हैं। साध्वीश्री ने कहा कि व्रत धर्म है, अव्रत अधर्म है, त्याग धर्म है और भोग अधर्म है। इससे पूर्व साध्वीश्री प्रियंवदाजी ने संयोजकीय वक्तव्य में कहा कि आचार्यश्री भिक्षुजी लक्ष्यनिष्ठ, आचारनिष्ठ, वैराग्यनिष्ठ व समर्पणनिष्ठ संत थे। उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति के लिए सुख-सुविधाआंे को त्यागकर संयम का कंटकाकीर्ण मार्ग अपनाया। साध्वीश्री प्रेरणाश्रीजी ने सरस मुक्तकों के द्वारा भावाभिव्यक्ति की, मृदुयशाजी ने विचार रखे व ॠद्धियशाजी ने कविता के द्वारा आचार्यश्री के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। संदीप बरि़डया व सूरत के नीलेश बाफना ने भावपूर्ण गीतों की प्रस्तुतियां दी। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने मंगलाचरण किया। तेरापंथी सभा के रमेश कोठारी ने सभी का स्वागत किया। कोठारी ने नीलेश बाफना का साहित्य भेंट कर सत्कार किया।