‘आत्मा का असली चंदन है सिद्धितप’

अनेक आचार्यों-संतों के सान्निध्य में गाजे बाजे के साथ हुआ सिद्धितप पारणोत्सव

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बेंगलूरु। यहां फ्रीडम पार्क के विशाल पांडाल में रविवार को शहर के समस्त मूर्तिपूजक संघों व सिद्धितप आयोजन समिति के तत्वावधान में अनेक आचार्यों, उपाध्यायश्री व संतवृंदों के सान्निध्य में ‘सिद्धितप पारणोत्सव’’ मनाया गया। सभी का स्वागत उत्तमचंद भण्डारी ने किया। समिति के संयोजक प्रकाश राठौ़ड ने जिन शासन में त्याग-तपस्या के महत्व पर रोशनी डालते हुए कहा कि यहां अलग-अलग क्षेत्रों में चातुर्मासार्थ विराजित संतों का एक साथ दर्शन का सान्निध्य व सैंक़डों तपस्वियों की अनुमोदना का पावन अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि २२६ तपस्वियों द्वारा सिद्धितप के माध्यम से स्वयं की आत्मा की कर्मनिर्जरा तो हुई ही है, साथ ही शहर में तप-धर्माराधना के क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत भी हुई है। राठौ़ड ने कहा कि गुरुजनों की वाणी को दुनिया की कोई ताकत नहीं बांट सकती हैतथा त्याग तपस्या से ब़़डा सुख वैभव कुछ नहीं है। इस अवसर पर आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने तप को आत्मा का असली चंदन बताते हुए सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। आचार्यश्री चन्द्रजीतसूरीश्वरजी ने कहा कि तप की साधना पापों का नाश करती है। उन्होंने सिद्धितप के सफलतम आयोजन की अनुमोदना करते हुए समिति के प्रयासों को सराहनीय बताया। साथ ही अगले वर्ष इसी प्रकार सामूहिक रुप से मृत्युंजय तप कराने की प्रेरणा भी दी। आचार्यश्री ने कहा कि निश्चित रुप से भावनाओं से कोई काम संपन्न नहीं होता इसके लिए उदारता भी जरुरी है। ऐसे आयोजनों में उदारमना लाभार्थियों के प्रति आशीर्वादी वक्तव्य में चन्द्रजीतजी ने कहा कि उन्हें भी तपस्वियों के इस विशिष्ट पुण्य का लाभ मिलेगा। इस अवसर पर राष्ट्रसंतश्री ललितप्रभसागरजी ने अपने विशेष अंदाज में समस्त तपस्वियों की अनुमोदना करवाई, जिसके तहत उपस्थितजनों को सामूहिक ख़डाकर-शीश नवाकर तथा तालियों की ग़डग़डाहट ने पांडाल को गुंजायमान कर दिया। अपने संक्षिप्त एवं सारगर्भित वक्तव्य में उन्होंने कहा कि सिद्धितप करने वालों के चरणों की धूल श्रद्धा से अपने माथे पर लगा लें, सभी नौ ग्रह आपके अनुकूल हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह धूल तीर्थंकरों के चरणों की धूल के समान पवित्र और चमत्कारी है। क्षमापना पर्व के अवसर पर उन्होंने सिद्धितप की तुलना दुश्मन को गले लगाकर क्षमा करने की बात करते हुए कहा कि असल मायने में ३६ इंच का सीना भी उसी का है। क्षमा को हर समस्या का समाधान बताते हुए ललितप्रभजी ने ने संवत्सरी के आयोजन भी सामूहिक रुप से किए जाने की प्रेरणा दी।

आचार्यश्री मुक्तिसागरसूरीश्वरजी ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस धरा पर इंसान की तरह जीना सीखने की सीख देते हुए विस्तार से कहा कि क्षमा लेना व देना वीरों का काम है। उन्होंने कहा कि क्षमा की साधना करे उसी का जग में नाम है। आचार्यश्री ने कहा कि सामूहिक संवत्सरी का आयोजन समस्त जैन धर्म संप्रदायों के संतजन राष्ट्रीय स्तर पर एकमत होने पर ही संभव है उन्होंने कहा कि यदि ऐसा हो जाए तो जिनशासन का नजारा कुछ ओर ही होगा। उन्होंने सिद्धितप में कम से कम १३ वर्ष के दर्श रोहित शाह व अधिकतम ८० वर्षीय बुजुर्ग की तप की अनुमोदना करते हुए तप के महत्व पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम में तपस्वी दिव्ययशाजी, अमीपूर्णाश्रीजी आदि साध्वियां भी उपस्थित थीं। इस मौके पर समस्त सिद्धितप करने वाले तपस्वियों का उत्कृष्ट बहुमान किया गया। ब़डी संख्या में शामिल हुए श्रद्धालु अपने-अपने स्थानों से वरघो़डे के रुप में आयोजन स्थल पर गाजे-बाजे के साथ पहुंचेथे। कार्यक्रम का संचालन सुरेन्द्रगुरुजी ने किया। गुरुभक्ति व तप अनुमोदना की संगीतमयी प्रस्तुतियों के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। सभी का आभार प्रकाश राठौ़ड ने जताया।