बेंगलूरु/दक्षिण भारतयहां के वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में यहां गोडवा़ड भवन में उपाध्याय श्रीरवीन्द्रमुनिजी ने शुक्रवार को मंगलाचरण से प्रवचन धर्म सभा की शुरुआत की। इस अवसर पर सलाहकार श्री रमणीक मुनिजी अपने दैनिक प्रवचन में कहा कि श्रवण भगवान महावीर स्वामी की जिनवाणी अंग संग रहनी चाहिए्। उन्होंने कहा कि जहां सूर्य है वहां प्रकाश है, जहां चंद्रमा है वह चांदनी है, जहां काया है वहां छाया है तथा जहां जान प्राण और आत्मा है वही आदमी जिंदा रहता है यानी यह कभी अलग हो ही नहीं सकते। पति और पत्नी को सुख-दुख के समान साझीदार बताते हुए मुनि श्री ने सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र की धर्मपत्नी तारामती के चारित्रिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि निश्चित रूप से तारामती के चरित्र को जब भी महिलाएं पढेगी वे अपने जीवन धर्म के प्रति शिक्षित अवश्य होगी। विशुद्ध प्रेम व गृहस्थ को धर्म बताते हुए रमणीकमुनिजी ने कहा जब परस्पर एक दूसरे के प्रति त्याग करने के लिए तैयार हो जाए तभी गृहस्थ धर्म बनता है। जब कोई दूसरों की खुशी के लिए अपनी खुशी को न्यौछावर करने का संकल्प लेता है तब गृहस्थ धर्म बनता है। जहां एक दूसरे के साथ छीना झपटी स्वार्थ मतलब परस्ती से रिश्ता निभाया जाता है वह धर्म नहीं गृहस्थ पाप बनता है। इतिहास की दो घटनाओं का जिक्र करते हुए सलाहकारश्री ने कहा कि जहां दूसरे का हक छीना जाता है या छीने जाने की योजना बनाई जाती है वहां महाभारत तैयार होता है और जहां एक दूसरे के लिए त्याग या सब कुछ न्यौछावर किया जाता है वहां रामायण का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि रामायण भी हमारे जीवन में है और महाभारत भी हमारे जीवन में है। कलयुग में भी हमारे जीवन भी रामायण का निर्माण हो तो गृहस्थ धर्म बन सकता है और स्वार्थ के वशीभूत होकर दूसरों की खुशियां हमारे मन में खटके तो वहां महाभारत का निर्माण होता है। व्यक्ति को इस दौर में स्वयं को निर्णय करना चाहिए कि वह गृहस्थ धर्म में रहकर रामायण के राम या महाभारत के धृतराष्ट्र-दुर्योधन बनकर रहता है। इससे पूर्व उत्तराध्ययन सूत्र के ११ अध्ययन में बहु श्रुत पूजा की गीतिका वीर प्रभु की अंतिम वाणी सुन लो और सुना लो जीवन धन्य बना लो, उतराध्ययन में गुंजित होते प्रभु शिक्षा अपना लो, जीवन धन्य बना लो प्रस्तुत की। श्रुत को ज्ञान व बहू को बहुत सारा बताते हुए ऋषि मुनि जी ने कहा कि बहु श्रुत को बहुत उपमाओ में बताया गया है। उन्होंने कहा श्रुत का मिलना आसान हो सकता है मगर इसे संभालना कठिन होता है। ज्ञान को जस का तस धारण करने को बहश्रुत कहते हैं जिस व्यक्ति में विनम्रता है उसी में ज्ञान टिकता है। पहली योग्यता बहू सूरत बनने की विनम्र होना है। धर्मसभा में श्री पारसमुनिजी ने मांगलिक प्रदान की । चिकपेट शाखा के महामंत्री गोतम चन्द धारिवाल ने संचालन किया। इन्द्रचंद बिलवाडीया ने बताया कि धर्म सभा मे शहर के विभिन्न उपनगरीय संघो से ब़डी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।