लड़ाई-झगड़ा करके संबंधों को मत बिगाड़ो : संत अरुणविजय

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हैदराबाद। यहां के फीलखाना स्थित श्री महावीर स्वामी जैन श्वेताम्बर संघ में विराजित संतश्री अरुणविजयजी म.सा. ने बुधवार को अपने प्रवचन में कहा कि संसार में सभी जीव जीना चाहते हैं। कोई भी जीव मरना नहीं चाहता है। जन्म देने का अधिकार हमारा नहीं है तो मरने का अधिकार भी हमारा नहीं है। जगत में दिखाई देने वाली स्वभावजन्य विषमता मोहनीय कर्म के कारण है। शरीर की भिन्नता-विविधता नाम कर्म के कारण है। किसी को दो पैर वाला, किसी को चार पैर वाला तो किसी को बगैर पैर का शरीर मिला है। यह सब नाम कर्म की कृपा है।संतश्री ने कहा कि लग्नग्रंथी की गांठें और कप़डे की गांठें तुरंत खुल सकती हैं, लेकिन कर्म की राग द्वेष की गांठें बहुत ही भयानक होती हैं इन्हीं गांठों के प्रभाव से भवभ्रमण बढता रहता है। अत: ल़डाई-झग़डा करके संसार के संबंधों को मत बिगा़डो। उन्होंने कहा कि प्रभु महावीर ने ऐसा कभी नहीं कहा कि मेरे नाम की माला गिनो या मेरे नाम का ही रटण करो। प्रभु ने कहा, मेरी पूजा नहीं मेरे वचनानुसार अपना जीवन बनाओगे तो आपका उद्घार अवश्य होगा।संतश्री ने कहा कि खेत में जैसा करेला होता है वैसा ही खाया जाता हैतो डायबिटीज की बीमारी नहीं होती है, वैसे ही जैसे भगवान का स्वरुप है वैसा स्वरूप मानोगे-स्वीकारोगे तो मिथ्यात्व की बीमारी ठीक हो जाएगी। उन्होंने कहा कि रत्नों एवं सोने में लोभ बुद्घि तथा लोहे और पीतल में द्वेष बुद्घि ही कर्मबंध का मुख्य कारण है। अत: पत्थर व रत्न और सोने व लोहे में समान भाव-समभाव गुण की वृद्घि के लिए सामायिक की क्रिया करने को कहा है। बैठक लेकर सामायिक करना कायिक सामायिक है। समभाव में रहना यह भाव सामायिक है।मुनिश्री हेमंतविजयजी म.सा. ने कहा कि फीलखाना आदि विविध संघ में एक अनूठा महायज्ञ का आयोजन किया गया है। बकरीद के दिन पूरे विश्व में लाखों-करो़डों मूक, असहाय, निर्दोष, जीवों का बेरहमी से कत्लेआम होगा। इन सभी निर्दोष प्राणियों की आत्मशांति के लिए शनिवार २ सितम्बर को एक आयंबिल तप करना है। हम इतनी ब़डी हिंसा को रोक नहीं सकते तो कम से कम एक आयंबिल करके घी-दूध आदि का त्याग करके करो़डों जीवों की सहानुभूति जरुर व्यक्त कर सकते हैं। मुनिश्री ने कहा कि आप जहां कहीं पर भी रहते हो वहां के श्रीसंघ में आयंबिल जरुर करें। उसी दिन अकबर प्रतिबोधक श्री हीरविजयसूरी म.सा. की पुण्यतिथि भी है।