क्षमापना पराये को भी बनाती है अपना : मुनि संयमरत्न

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मदुरै। यहां आचार्यश्री जयंतसेनसूरीश्वरजी म. सा. के शिष्य मुनिश्री संयमरत्न विजयजी म.सा. और मुनिश्री भुवनरत्न विजयजी म.सा. ने पर्युषण पर्व के अंतिम दिन सांवत्सरिक क्षमापना दिवस पर कहा कि क्रोध का प्रतिरोधक तत्व क्षमा है। जहां क्रोध है, वहां प्रतिशोध है। जहां क्षमा, वहां प्रतिबोध है। बाह्य शत्रु को माफ व अंतःकरण को साफ करने का इंसाफ क्षमापना पर्व करता है। क्षमा रुपी शस्त्र जिसके हाथ में है, उसका दुर्जन कुछ भी नहीं बिगा़ड सकता। क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं। क्षमा उसी से मांगनी चाहिए जिनसे हम बोलते नहीं हैं। क्षमापना सभी को अपना बना लेती है। सभी जीवों के प्रति मित्रता का भाव बना रहे, यही प्रतिक्रमण का सार है। प्रतिक्रमण हमें अतिक्रमण से दूर ले जाता है। सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करके पूरे जैन समाज ने परस्पर क्षमायाचना कराई। मुनि श्री ने तपस्वियों की अनुमोदना करते हुए कहा कि खाने वाला हर समय और सब कुछ खा नहीं सकता। जबकि उपवास करने वाला हर समय खाने की चीज त्याग कर सकता है, यही तप की महिमा है। नींद में शरीर के सभी अंगों को छुट्टी मिलती है,परंतु पेट को तो तप में ही आराम मिलता है। सुमतिनाथ मंदिर प्रांगण से सुमतिनाथ जैन संघ व मदुराई जैन नवयुवक मंडल के तत्वाधान में सभी तपस्वियों का सामूहिक भव्य वरघो़डा निकाला गया। मुनिश्री की निश्रा में होने वाले चातुर्मासिक तप में मासक्षमण, सिद्धि तप,१५, १३, १२, ११, १० व ८ उपवास के ५० से अधिक तपस्वियों ने सामूहिक रूप से पच्चक्खाण लेकर संतों से आशीर्वाद प्राप्त किया। सुमतिनाथ जैन संघ की आज्ञा से लाभार्थी परिवार द्वारा तपस्वियों का व लीला देवी भवन को चातुर्मासिक प्रवचन हेतु निस्वार्थ भावना से देने पर तिलोकचंद हरण का तिलक, माला, शॉल व अभिनंदन पत्र भेंट कर सम्मान किया गया।