क्षमायाचना से व्यक्ति हल्का हो जाता है : मुनि अमृतकुमार

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चेन्नई। यहां आचार्यश्री महाश्रमणजी के शिष्य डा. अमृतकुमारजी एवं मुनिश्री नरेशकुमारजी के पावन सान्निध्य में पल्लावरम में पर्युषण-पर्व सानन्द संपन्न हुआ। पल्लावरम में आध्यात्म का सागर जैसे हिलोरें ले रहा था, आठ दिनों तक आध्यात्म का सराहनीय संगम रहा। हर घर में तपस्या व आध्यात्म की झ़डी लगी हुई थी। संवत्सरी के पावन अवसर पर मुनिश्री अमृतकुमारजी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि संवत्सर शब्द का अर्थ होता है वर्ष। जैनधर्म का सबसे महान पर्व संवत्सरी है। आज का दिन वास्तव में मैत्रीदिवस है, आज इस पर्व पर हमें चिंतन करना है कि वर्ष भर में हमसे कितनी भूलें हुई हैं, कितना प्रमाद हुआ है जिससे बैर-विरोध हुआ है, उसे आज के दिन आत्मावलोकन करना है। भविष्य के लिए उनसे संकल्प करने हैं। मुनिश्री ने आगे भगवान महावीर के जन्म से लेकर निर्वाण तक के बारे में बताया। सती चंदनबाला का रोचक जीवन भावनात्मक शैली में मुनिश्री नरेशकुमारजी ने प्रस्तुत किया। मुनिश्री नरेशकुमारजी ने संवत्सरी पर्व की महत्ता बताते हुए कहा कि यह महान आध्यात्मिक पर्व वर्ष में एक बार आता है व सबको हृदय से मैत्री और प्रमोद भावना से भर देता है। अगले दिन हम संकल्प करें कि जिससे भी बैर-विरोध है उससे सरल हृदय से क्षमा भावना कर लें। रविवार कोक्षमापना दिवस मनाया गया। पल्लावरम श्रावक-श्राविका समाज ने सर्वप्रथम आचार्यश्री महाश्रमणजी से खमत खामणा किया। तत्पश्चात मुनिश्री से वर्षभर में हुई अविनय असातना के लिए क्षमायाचना की। मुनिश्री अमृतकुमारजी ने कहा कि क्षमा लेना व देना महान कार्य है, क्षमायाचना से व्यक्ति अंदर-बाहर से हल्का हो जाता है, नए जीवन की शुरुआत करता है।मुनिश्री ने आचार्यप्रवर, साधु संतों, श्रावक-श्राविका समाज से क्षमायाचना की। मुनिश्री नरेशकुमारजी ने क्षमादिवस पर कहा कि आप ८४ लाख जीवयोनि से खमतखामणा करें या ा करें लेकिन अपने भाई से जरूर करें। कार्यक्रम का संचालन मुनिश्री नरेशकुमारजी ने किया।