चातुर्मास एकता के रुप में आयोजित होगा सामूहिक सिद्धितप

समस्त मूर्तिपूजक संघों की सहमति से हो रहा है यह आयोजन

दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। शहर के आदिनाथ जैन मंदिर में विराजित आचार्यश्री चन्द्रजीतसूरीश्वरजी म.सा. से मंगलवार को दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह सम्पादक श्रीकांत पाराशर ने मुलाकात की तथा सिद्धितप सहित धार्मिक विषयों कर चर्चा की। इस मौके पर चिकपेट के अध्यक्ष उत्तमचन्द भंडारी व मंत्री प्रकाशचन्द राठौ़ड उपस्थित थे। इस मौके पर पाराशर ने चिकपेट में चातुर्मास करने आए पन्यासश्री इन्द्रजीतविजयजी के भी दर्शन कर आशीर्वाद ग्रहण किया। शहर के विभिन्न मूर्तिपूजक संघों के समन्वय से बेंगलूरु सामूहिक सिद्धितप आयोजन समिति के तत्वावधान में शहर में अत्र विराजित साधु साध्वियों की निश्रा में आयोजित सामूहिक सिद्धितप के बारे में बताते हुए आचार्यश्री चन्द्रजीतसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि इस वर्ष चातुर्मास एकता के रुप में सभी संघों में सामूहिक सिद्धितप का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि आत्मा जैन धर्म की री़ढ की हड्डी है और आत्मा का अर्थ होता है स्व। जैन धर्म में स्व (आत्मा ) को प्राथमिकता दी गई है। आत्मा अर्थात स्व को शुद्ध करने व उसके विकास के लिए तप किया जाता है। आचार्यश्री ने कहा कि आत्मकल्याण के तीन प्रमुख मार्ग हैं। आत्मकल्याण के लिए ज्ञान श्रेष्ठ है, भक्ति सीधा रास्ता है तो तप शॉर्टकट है। तप के माध्यम से हम कम समय में अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं। ज्ञान कठिन मार्ग है और ज्ञानी ही इस कार्य को कर सकते हैं परन्तु तप आमश्रद्धालुओं के बस की बात है और सरल है। आध्यात्मिक शांति के लिए श्रेष्ठ मार्ग है तप। आचार्यश्री चन्द्रजीतसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि तप का एक घटक है उपवास । उपवास से शरीर के सारे रोग खत्म हो जाते हैं। शरीर ही शरीर का डाक्टर है। जैन शास्त्र में कई प्रकार के तप होते हैं परन्तु जो आत्मा को सिद्ध करे, निर्मल करे व निर्दोष बनाए उसे सिद्धितप कहते हैं। सिद्धितप ४५ दिन की तपस्या होती है जिसमें ३६ उपवास होते हैं तथा ७ दिन पारणे होते हैं। इस तप में एक दिन का उपवास फिर पारणा के दिन बियासणा (दो समय भोजन) होता है और ऐसे ही उपवास के दिन ब़ढते हुए आठ उपवास तक पहंुच जाते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि जैन उपवास करने के लिए शारीरिक व मानसिक इच्छा होना अतिआवश्यक है। उन्होंने बताया कि आहार ही मृत्यु है और आहार पर विजय पाना तपस्या है। उन्होंने सामूहिक सिद्धितप के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सामूहिक रुप से तप करने से धर्म की प्रभावना होती है। व्यक्तिगत रुप से उपवास करने से व्यक्ति को स्वयं को फायदा होता है जबकि सामूहिक रुप से तप करने से सर्जन अर्थात पुण्यकर्म का अर्जन होता है जिससे समस्त समाज को लाभ होता है। दूसरों को प्रेरणा मिलती है। आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई तप समूह में होता है तो समाज से और समाजों का जु़डाव ब़ढता है। समाज जु़डाव से धर्म का जागरण होता है और धर्म के जागरण से नया इतिहास बनता है। सामूहिक रुप से धर्म करने से एक व्यक्ति एक समूह, एक परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। आचार्यश्री चन्द्रजीतसूरीश्वरजी ने सामूहिक धर्म के लाभ गिनाते हुए कहा कि ‘सबका साथ, खुद का विकास, खुद के विकास के साथ सबका विकास’’ होता है। उन्होंने कहा कि सामूहिक सिद्धितप कज्ञा आयोजन स्वकल्याण के साथ धर्म प्रभावना और प्रेरणा जागृत करने के लिए किया जा रहा है। सामूहिक सिद्धितप के आयोजन के बारे में अधिक जानकारी देते हुए समिति के संयोजक प्रकाशचन्द राठौ़ड ने बताया कि पूरे बेंगलूरु में विभिन्न संघों में विराजित साधु साध्वियों के सान्निध्य में १४ जुलाई से २५ अगस्त तक सिद्धितप की सामूहिक आराधना होगी तथा शहर को विभिन्न जोनों में बांटकर संबंधित संघों में बियासणा की व्यवस्था की जाएगी। राठौ़ड ने बताया कि बेंगलूरु भर में सिद्धितप को लेकर बहुत उत्साह है और लगभग ५०० तपस्वियों के शामिल होने की संभावना है। २५, २६ व २७ अगस्त को सामूहिक सिद्धितप पूर्णाहुति के मौके पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। २५ अगस्त को विभिन्न संघों में सामूहिक प्रत्याख्यान, २६ अगस्त को भक्ति संध्या व सांझी का कार्यक्रम तथा २७ अगस्त को तपस्वियों का पारणा, वरघो़डा व सम्मान कार्यक्रम होगा।