धारवा़ड। यहां शीतल चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर संघ के तत्वावधान में आचार्यश्री महेन्द्रसागरसूरीश्वरजी, मुनिश्री राजपद्मसागरजी, मेरुपद्मसागरजी का नगर में चातुर्मास प्रवेश जुलूस के रुप गाजे-बाजे के साथ धूमधाम से हुआ। स्थानीय सुभाष चौक से जुलूस रवाना हुआ, जिसमें बैंड, आदिवासी लोकनृत्य करते कलाकार, भगवान महावीर व गुरुदेव की तस्वीरयुक्त झांकी तथा हाथी, घो़डे, भी शामिल थे, वहीं महिलाएं कलश लेकर चल रहीं थीं। जगह जगह तोरणद्वार भी लगाए गए थे। अनेक संघों के पदाधिकारियों सहित ब़डी संख्या में श्रद्धालुओं ने इसमें भागीदारी निभाई। शहर के विभिन्न मार्गों गुजरती हुई शोभायात्रा शहर के मॉडल हॉल पहंुचकर धर्मसभा में परिवर्तित हो गई। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए आचार्यश्री महेन्द्रसूरीश्वरजी ने कहा कि जिस प्रकार फूल की तस्वीर ली जा सकती है-सुगन्ध नहीं, कोयल की कूहू की आवाज को रिकॉर्ड किया जा सकता है उमंग नहीं, और मोर के नृत्य की मूवी बनाई जा सकती है, उसके भीतर के उत्साह को नहीं। वैसे ही श्रद्धालुओं का मेरे प्रति जो अपार प्रेम है उसकी अनुभूति मैं ही कर सकता हूं। उन्होंने कहा कि इस तरह उत्साहपूर्वक चातुर्मास के इस पावन पर्व का अधिकाधिक संख्या में धार्मिक लाभ लेना है। राजपद्मसागरजी ने ज्ञान, दर्शन व चारित्र की त्रिवेणी में डूबकी लगाने की प्रेरणा दी। इस मौके पर महेन्द्रसागरजी द्वारा संकलित-आलेखित पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। अनेक वक्ताओं ने भी विचार रखे। कार्यक्रम में कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु आदि प्रदेशों से ब़डी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। धारवा़ड संघ के फतेहचन्द जैन एवं हेमराज जैन ने सभी का स्वागत किया।