‘चारित्र दुनिया की सबसे बड़ी विश्वसनीय संपदा’

बेंगलूरु। यहां कर्नाटक जैन भवन में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी ने सोमवार को अपने प्रवचन में कहा कि धर्म और जीवन में अकिंचन्य धर्म का बहुत महत्व है। उन्होंने कहा कि उत्तम अकिंचन्य धर्म में कहा गया है कि क्रोध, मान, माया, लोभ, असत्य व असंयम इत्यादि की दुर्गंध शेष नहीं रहनी चाहिए। आचार्र्यश्री ने कहा कि आत्मा की मनोभूमि को अकिंचन्य के जल से पूर्ण स्वच्छ पवित्र करने पर ही उत्तम ब्रह्मचर्य रुप परमात्मा आकर विराजमान हो सकेंगे। पर्युषण पव को ओलंपिक प्रतियोगिता की संज्ञा देते हुए पुष्पदंतजी ने कहा कि अकिंचन्य साधना मैच के आखिरी ओवर की अंतिम गेंद है जो कि जब तक न फेंकी जाय तब तक मैच में जय-पराजय का निर्णय नहीं होगा। उन्होंने कहा कि दान में उत्साह, अनुग्रह व प्रसन्नता अनिवार्य है। वही अकिंचन्य बनेगा जिसमें यह सब होंगे। दान सार्थक हो तो पुण्य की वर्षा होती है। चारित्र दुनिया को सबसे ब़डी विश्वसनीय संपदा बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि इसके समक्ष राजा-महाराजा, चक्रवर्ती, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मृत्यु तक झुकते हैं। उन्होंने कहा कि अकिंचन्य धर्म कहता है कि ज़ड आश्रित जीवन नहीं जीना चाहिए।