जैन धर्म का आधार ही अहिंसा है : संत अरुणविजय

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हैदराबाद। यहां के फीलखाना स्थित श्री महावीर जैन स्वामी जैन मंदिर में विराजित संत अरुणविजयजी म.सा. की शुभनिश्रा में जगद्गुरु अकबर प्रतिबोधक आचार्यदेव श्री हीरविजयसूरी म.सा. की दसवीं पुण्यतिथि हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर साध्वीश्री राजप्रज्ञाजी म.सा. की सुशिष्या साध्वीश्री राजपर्षदाजी म.सा. ने कहा कि आचार्यश्री वर्ष १६३९ में गंधार से विहार करके पहली बार दिल्ली पधारे। तब पूज्यश्री की स्वागतयात्रा में ६ लाख लोग जैन समुदाय के उपस्थित थे। गुलाब मौन रहकर भी अपनी सुवास से नामना प्राप्त करता है। सूर्य भी मौन रहता है और स्वयं के प्रकाश से अंधेरा दूर करके मानवजाति पर उपकार करता है। ठीक वैसे ही आचार्य हीरविजयसूरीजी म.सा. आज मौन हैं परंतु उनकी शासन प्रभावकता हमें गुणवान करने के लिए प्रेरित करती है।

साध्वीश्री राजपूर्णिताजी म.सा. ने कहा कि अकबर बादशाह के राजदरबार की चकाचौंध देखकर भी जो अनासक्त निर्लोभी रह सके यह बहुत ब़डी बात है। शास्त्र अनुसार राजपिंड राजा के राज दरबार की गोचरी (भिक्षा) न लेते हुए पूज्यश्री ने अकबर जैसे हिंसक राजा को भी अहिंसक बनाया। तब गुरुदेव ने एक ही उपदेश दिया था कि शाता देने से ही शाता मिलती है। आयंबिल तप ब़डा मांगलिक तप होता है। आयंबिल रुक्ष (रुखा) पदार्थ ही खाना प़डता है। ऐसा रुक्ष पदार्थ का आहार लेते देखकर राजा भी प्रभावित हुआ था।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए संतश्री अरुणविजयजी म.सा. ने कहा कि जैन धर्म का आधार अहिंसा है। मानवता ही सर्वोपरि धर्म है, ऐसा मानने वाले धर्मांे ने पशु हिंसा में पाप नहीं है ऐसा मान लिया है, यही सबसे ब़डी गलती हुई है। जैन धर्मानुसार सभी जीव चाह पशु हों, पक्षी हांे या चींटी, की़डे-मको़डे हों सभी के कल्याण की भावना सामने आई है। उस काल में हिन्दुस्तान सोने की चिि़डया कहलाता था तब मुगल राजा, यवन बादशाह तथा खुद सिकंदर भी हिंदुस्तान को लूटने के लिए आए थेऔर करीब ८५० साल तक हम पर राज करके गए थे। संतश्री ने कहा कि संसार की सभी संस्कृतियों में विकृति आई है, बिना विकृति की संस्कृति का नाम ही श्रमण संस्कृति है। भगवान महावीर को गए २५०० साल बीत गए फिर भी लोच की केशलूचन की संस्कृति आज भी अविच्छिन्न पणे से चल रही है। आज भी जैन साधु-साध्वी पैदल विहार करते हैं। आज भी जैन साधु एक ही कलर के बिना सिलाई किया वेश परिधान धारण कर रहे हैं। इतनी लंबी संस्कृति की परंपरा और किसी की नहीं चली है।