दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबंेगलूरु। यहां जयनगर स्थित धर्मनाथ जैन मंदिर में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री चन्द्रजीतसूरीश्वरजी ने शुक्रवार को अपने प्रवचन में कहा कि प्रभु का काम सर्जन का व गुरु का काम संचालन का है। प्रभु तो शासन के साथ केवल ३० साल ही थेऔर शासन २१ हजार साल तक चलनेवाला है। हम सभी तक प्रभु का शासन लाने का उपकार गुरु का ही है। संसार को अपने ही दोष बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि भ्रमण उन्हीं दोषों का उत्पाद है। उन्होंने कहा कि सुख में तो हम अपने आपकी पहचान भूल जाते हैं लेकिन दुख होता है तब हम स्वयं की अनुभूति कर लेते हैं। चन्द्रजीतजी ने कहा कि दौ़डना राग है यानी पदार्थों के लिए भागना ही राग है। पदार्थ को केवल देखना यानी उनकी शक्ति एवं सीमा को देख लेना विराग है और पदार्थों को छो़ड देना त्याग है।