बेंगलूरु। महोपाध्याय ललितप्रभसागरजी महाराज ने कहा है कि हमारे जैसे मित्र होते हैं वैसा ही हमारा चरित्र बनता है। चरित्र को अगर अच्छा बनाना है तो हम कुछ न करें, केवल अच्छे लोगों को अपना मित्र बनाएं, हमारा चरित्र अपने आप अच्छा बन जाएगा। जैसे पानी की एक बूँद मिट्टी में गिरे तो मिट्टी बन जाती है, गर्म लोहे पर गिरे तो भस्म हो जाती है, साँप के मुँह में गिरे तो जहर बन जाती है, केले के गर्भ में गिरे तो कपूर बन जाती है और सीप के मुँह में गिरे तो सच्चा मोती बन जाती है। ठीक वैसे ही इंसान को जैसी संगत मिलती है उसकी वैसी ही रंगत बन जाती है। अगर हमारे जीवन में कोई अच्छी आदत है तो वह किसी-न-किसी अच्छे मित्र की बदौलत है और कोई बुरी आदत है तो वह भी किसी बुरे मित्र की संगत के कारण है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति पर माता-पिता, घरवालों से भी ब़ढकर अगर किसी का प्रभाव प़डता है तो वह उसका मित्र होता है। इसलिए व्यक्ति मित्र बहुत ही सोच-समझकर बनाए। मित्र सैंक़डों हों यह जरूरी नहीं,भला मित्र तो एक भी बहुत होता है। संत ललितप्रभजी मंगलवार को मराठा हॉस्टल में परिवार सप्ताह के दूसरे दिन ‘भला मित्र तो एक ही भला‘ विषय पर श्रद्धालुआंे को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इंसान को तीन चीजें नसीब से मिलती हैं – अच्छी पत्नी, अच्छी संतान और अच्छा दोस्त। पत्नी का चयन परिवार वाले करते हैं, पुत्र का चयन भाग्य करता है, पर मित्र का चयन इंसान स्वयं करता है इसलिए पत्नी या संतान गलत निकल जाए तो इसका पूरा दोष आपको नहीं है, पर दोस्त गलत निकल जाए तो इसका जिम्मेदार व्यक्ति स्वयं होता है। उन्होंने कहा कि हमारी दोस्ती सरोवर-पंछी जैसी न हो कि प्यास लगी तो पानी पिया और उ़ड गए। दोस्ती मोम और धागे की तरह हो कि धागा जला तो मोम भी पिघलने लगा। हमारा दोस्त किसी ढाल जैसा हो जो सुख में तो पीछे रहे, पर दुख में हमारी रक्षा के लिए आगे आ जाए। केवल बातें करने वाले, मौज-शौक उ़डाने वाले मित्र ज्यादा काम के नहीं होते। जो सुख-दुख में साथ निभाते हैं वही सच्चे मित्र कहलाते हैं। संतप्रवर ने कहा कि जब भी चार दोस्त इकठ्ठे होते हैं विशेषकर युवा दोस्त तो इधर-उधर की, उल्टी-सीधी बातें करना शुरू कर देते हैं। अगर आपका मित्र अकेले में भी आपको सच्चरित्रता की प्रेरणा दे, ईमानदारी की बात करे, प्रेम और मिठास से जीने की राह बताए, एक-दूसरे के काम आने का जज्बा जगाए तो समझ लेना वह आपके काम का मित्र है। उन्होंने कहा कि अगर आपका मित्र दुर्व्यसनी है तो सावधान या तो उसे दुर्व्यसन छो़डने के लिए कहे या फिर उस दोस्त को ही छो़ड दे। अगर आपने उसे नहीं छो़डा तो एक दिन वह आपको दुर्व्यसनी बनाकर छो़डेगा और फिर आपके पैसे से खुद के शौक पूरे करने लग जाएगा। संतप्रवर ने कहा कि हमें तीन तरह के मित्रों से सदा बचकर रहना चाहिए – स्वार्थी, मूर्ख एवं चापलूस। ये अपने भले के लिए दूसरों को मित्र बनाते हैं और एक दिन अपने मित्र को विपदा में डालकर खुद गायब हो जाते हैं। गधे के पीछे और सांड के आगे से बचना चाहिए, पर ऐसे गलत मित्रों से चारों ओर से बचने की जरूरत हुआ करती है। संतश्री ने कृष्ण-सुदामा की मैत्री का भजन सुनाया। संघ के महामंत्री कुशल गोलेच्छा ने बताया कि बुधवार को सुबह ९ बजे ‘बच्चों को कैसे दें अच्छे संस्कार’’ पर प्रवचन होगा।