मन में देने की भावना रखें: साध्वी कुमुदलता

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हैदराबाद। यहां के श्री गुरु गौतम कुमुद प्रज्ञा स्थानक जैन संघ के तत्वावधान में महासती श्री कुमुदलताजी म.सा. आदि ठाणा-४ के सान्निध्य में महासती श्री राजकीर्तिजी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि पानी के पास बहुत कुछ है लेकिन एक चीज नहीं है वो क्या? धरती के पास बहुत कुछ है लेकिन एक चीज नहीं है। मनुष्य के पास एक चीज है लेकिन एक चीज नहीं है। इसी प्रकार से प्रकृति के पास भी एक चीज नहीं है वो क्या है? उन्होंने कहा कि पानी के पास छूत-अछूत की बीमारी नहीं है। धरती के पास गुमान, अहंकार नहीं है। मनुष्य के पास बहुत कुछ है पर आराम नहीं है। आराम में राम शब्द छिपा है। मनुष्य आ-राम, आ-राम को खोजता है पर उसे आराम नहीं मिलता। राम का नाम क्यों लें ‘रा’’ ऋषभ का प्रतीक है। ‘म’’ ये महावीर शब्द के लिए याद किया जाता है। आराम ऋषभ से लेकर महावीर को नमन हो जाता है। साध्वीश्री ने कहा कि आपके भीतर राम बनने की प्यास होगी। जिसके अंदर राम नहीं उसके लिए रामायण किस काम की? प्रकृति के पास एक चीज नहीं है, वह हमेशा देती है। धरती हमें रहने की जगह देती है। हमें कहीं कुछ फ्री में मिल जाता है तो चेहरे पर हंसी आ जाती है। कभी विचार किया है कि हम भी कुछ मुफ्त में दे दें? प्रकृति की तरह बांटे ऐसी हमेशा भावना रखंे। कुआं हमेशा सबकी प्यास बुझाता हैउसी प्रकार मन में देने की भावना रखें। राजा कर्ण से सीखें। देने से भावना बढती है।

साध्वीश्री ने कहा कि आज आलोचना हर जगह होती है। जो निंदा करता है उसकी हमेशा निंदा होती है। अपने जीवन में दूसरों के जीवन से गुणों को देखें, अवगुणों को न देखें। गुलाब के फूल की हमेशा खुशबू और सुंदरता को देखें, कांटे को न देखें। अच्छाई देखो, बुराई को गुणीवान को गुण लेना चाहिए। हमें अवगुण से क्या मतलब? गुणों को जीवन में ध्यान करना है। साध्वीश्री ने कहा कि गुरुवार को कलयुग का कल्पवृक्ष भक्ताम्बर के अनुष्ठान भक्ताम्बर के २६वें श्लोक का अनुष्ठान जो माइग्रेन की बीमारी से मुक्ति देता है, उस अनुष्ठान की प्रभावना का लाभ दीपराज, महावीरचंद, अजयकुमार कटारिया एवं महावीरचंद्र, चेतनकुमार, अर्हम कुशल लूनावत परिवार ने लिया। इस अवसर पर गौतम प्रसादी का लाभ गौतमचंद, अजीतकुमार खींचा परिवार ने लिया।