मर्यादित शुद्ध श्रावकाचार का पालन करें : श्रुतमुनि

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बेंगलूरु। श्रमण संघीय उपप्रवर्तक श्री श्रुतमुनिजी ने कहा कि श्रावक जीवन में बारह ब्रतों को धारण कर मर्यादित शुद्ध श्रावकाचार का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन एकता और मानवता के गुणों को जीवन में आत्मसात करना भी अत्यंत जरुरी है। वे हनुमंतनगर संघ के तत्वावधान में रविवार दोपहर ‘आओ सुश्रावक बनंे’’ विषयक श्रावक अधिवेशन में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। श्रुतमुनिजी ने कहा कि जीवन में श्रद्धाशीलता, सत्यशीलता व समझ सहनशीलता के गुण भी अपनाने चाहिएं। इस अवसर पर अक्षरमुनिजी ने श्रावक शब्द के तीन अक्षरों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रद्धावान, विवेकवान और क्रियावान बनें। कार्यक्रम में हनुमंतनगर के युवा मंडल व बालक मंडल द्वारा श्रावक जीवन के लिए शुद्ध सामायिक की आराधना, दान की महिमा, संघ की सेवा तथा विकृति नहीं संस्कृति के महत्व को दर्शाने वाली प्रेरक लघु नाटिकाओं का प्रभावी मंचन किया गया। श्रावक अधिवेशन में सभी को अपने जीवन में अपनाने के सात संदेश लिखे पोस्टरों-तख्तियों के माध्यम से प्रचार किया गया। सभी का स्वागत हनुमंतनगर के अध्यक्ष कल्याणसिंह बुऱड ने किया तथा आयोजन की रुपरेखा पर अपनी बात कही। इस अवसर पर जैन कॉन्फ्रंेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष केसरीमल बुऱड, जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ के अध्यक्ष पदमराज मेहता, जैन भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष नेमीचंद खींवसरा मूथा, मंत्री गौतमचंद गोटावत सहित शहर के अनेक संघ-समाज से जु़डे पदाधिकारियों-सदस्यों ने शिरकत की। हनुमंतनगर संघ के मंत्री भंवरलाल गादिया, सुनील सांखला, आनंद कोठारी, गौतमचंद ओस्तवाल, मनोज सोलंकी ने अपने-अपने विचार रखे। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन करते हुए संघ के उपाध्यक्ष अशोककुमार गादिया ने श्रावक जीवन के महत्व पर प्रकाश डाला। श्रावक अधिवेशन के चेयरमैन अमित बुऱड ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। इससे पूर्व सुबह के सत्र में श्रुतमुनिजी ने कहा कि आगम हमारे जीवन की योग्यताओं और पात्रताओं को निखारने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि सुख-दुख दिन-रात की तरह परिवर्तनशील है। मुनिश्री ने कहा कि सच्चा साधक वही है जो प्रत्येक परिस्थिति में समभाव, सहनशीलता को अपनाता है। अक्षरमुनिजी के १४ उपवास की तपस्या रविवार को गतिमान रही।