मां ही परिवार को एक सूत्र में पिरो सकती है : आचार्य महेन्द्रसागर

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धारवा़ड। यहां चिंतामणि शीतलनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में आचार्यश्री महेन्द्रसागरजी ने सोमवार को अपने प्रवचन मेंे मातृ-पितृ वंदन में कहा कि मां यानी नारी का सर्वोंच्च गौरव, ममता का सागर, स्नेह-वात्सल्य का भंडार, सेवा और समर्पण की मूरत तथा जिनके चरणों में स्वर्ग कहा गया है। उन्होंने कहा कि संसार में जितने भी महापुरुषों ने जन्म लिया है, सभी ने मां की कोख से ही जन्म लिया है इसलिए मां को रत्नकुक्षी कहा गया है। आचार्यश्री ने कहा कि मां पृथ्वी की तरह सहनशीला होती है। मां का परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने में ब़डा हाथ होता है। स्नेह-ममता और कर्त्तव्यपारायणता से वह पूरे परिवार को एकजुट रखने में सक्षम होती है तथा परिवार की धुरी होती है। उन्होंने कहा कि पिता की जिम्मेदारी निभाना भी आसान नहीं है। बच्चों का लालन-पालन, शिक्षा, धार्मिक व व्यावहारिक ज्ञान देना और उनकी व्यवस्था करना तथा सज्जन बनाना पिता के ही दायित्व हैं। महेन्द्रसागरजी ने माता-पिता के उपकारों का बखान करते हुए कहा कि आनंद के सागर में हिलोरंे लेने के लिए माता-पिता को दुखी करना छो़ड देना चाहिए, तभी व्यक्ति के सांसारिक जीवन के दुखों का अस्तित्व समाप्त होगा।