सामायिक से होती समता की प्राप्ति

मदुरै। यहां चातुर्मासार्थ विराजित मुनिश्री संयमरत्न विजयजी म. सा. एवं मुनिश्री भुवनरत्न विजय जी म. सा. ने रविवार को ‘कैसे करे सामायिक?‘ के विषय पर सामायिक के बारे में समझाया। उन्होंने कहा कि जिस क्रिया से समता की प्राप्ति व ममता की समाप्ति होती है, वह सामायिक है। समता व सद्गुणों को प्रकटीकरण की क्रिया सामायिक है। आश्रव द्वार को बंद करने के लिए सामायिक ताले के समान है, समभाव की पाठशाला है, आत्मघर में दो घ़डी शांति से बैठने का स्थान व योग साधना का अर्क है। शुद्ध भाव से की गई एक सामायिक भी नरक के बंधनों को तो़ड देने में समर्थ होती है। सामायिक करने से १४ राजलोक के जीवों को अभय दान, ब्रह्मचर्य का पालन व चार प्रकार के आहार का त्याग होने के साथ साथ शुभ भावना भी बनी रहती है। इस प्रकार सामायिक में दान, शील, तप व भाव इन चार प्रकार के धर्मों का पालन भी हो जाता है। उपाश्रय में सामायिक करने से एक आयंबिल का लाभ प्राप्त होता है।सामायिक करने से पूर्व वातावरण, उपकरण व विधि इन तीनों का शुद्ध होना अत्यंत आवश्यक है। वातावरण शुद्ध होने से शुभ भाव बना रहता है। उपकरण शुद्ध होने पर हम अतिक्रमण के पाप से बच जाते हैं और विधि की शुद्धि से हमारी बुद्धि भी बुद्ध की तरह शुद्ध व प्रबुद्ध हो जाती है। जब तक हम सामायिक में रहते है, तब तक हमारे अशुभ कर्म नष्ट होते रहते है। सामायिक में श्रावक, ४८ मिनिट तक साधु की तरह ही होता है। मुनिश्री ने सामायिक में लगने वाले १० मन के,१० वचन के व १२ काया के दोषों को विस्तारपूर्वक समझाया। सामायिक करने से मानव का जीवन संतुलित हो जाता है। संतुलित व्यक्ति हर स्थिति का समभाव से स्वागत करता है। संतुलित प्राणी अतुलित समता का स्वामी बन जाता है। विषमता को दूर करने का कार्य समता ही करती है।