‘सुदृढ संयमी थे आचार्य हीरसूरीश्वर’

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बेंगलूरु। यहां सिमंधर शांतिसूरी जैन संघ के आराधना भवन में आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने शनिवार को आचार्यश्री हीरसूरीश्वरजी के गुणानुवाद करते हुए कहा कि अपनी आत्मा का आत्महित करने वाला ही जगत में सच्चा परोपकार कर सकता है। हीरसूरीश्वरजी ने अपने आत्महित के साथ अनेक परोपकार किए। अकबर सम्राट के दिल में आचार्यश्री के प्रति पूर्ण आदर सम्मान था। उनके उग्र संयम जीवन के कारण ही अकबर ने उन्हें जगद्गुरु पद से नवाजा था। रत्नसेनजी ने कहा कि लोहे के चने चबाना आसान है लेकिन जीवन में आध्यात्म के भाव को प्राप्त करना अत्यंत ही कठिन है। उन्होंने कहा कि अनादिकाल के कुसंस्कारों के कारण जीवात्मा को अर्थ और काम की प्रवृत्ति में जो रस मिलता है वह रस उसे आत्महितकर प्रवृत्ति में जु़डने नहीं देता है। आचार्यश्री ने कहा कि आत्महित को लक्ष्य में रखकर प्रवृत्ति करने वाले लोग ही शिष्ट पुरुष कहलाते है। ऐसे शिष्ट पुरुषों के अनुसार यदि हमारा जीवन बनाया जाए तो हमारा जीवन भी आध्यात्म के ऊंचे शिखर पर पहुंच सकता है।