सेवा से बढ़कर धर्म नहीं : साध्वी दिव्यज्योति

चेन्नई। यहां के धोबीपेट स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ में साध्वीश्री दिव्यज्योतिजी म. सा. ‘अर्पणा’’ ने अपने प्रवचन में कहा कि सेवा धर्म परम धर्म है। दुनिया में सेवा से ब़ढकर कोई धर्म नहीं है। जैन धर्म का मूल सूत्र ही है परस्परोपग्रहो जीवानाम्। परस्पर का उपग्रह ही जीवन है। एक दूसरे की परस्पर सेवा में भावना के बिना परिवार व समाज तो चलना दूर अपना शरीर भी नहीं चल सकता है। हमारे शरीर के एक-एक अंग एक दूसरे की सेवा में तत्पर रहते हैं। बिना कहे किसी की सेवा करने वाला देव कहलाता है। कहने पर करने वाला मानव कहलाता है और कहने के बाद भी नहीं करने वाला दानव या पशु की श्रेणी में आता है। सेवा से करो़डों भवों से संचित कर्म झ़ड जाते हैं तथा पुण्य का भी अर्जन होता है। उन्होंने कहा कि एके्द्रिरय जीव की रक्षा करना भी अपेक्षाओं से अरिहंतों व सिद्धों की सेवा करने के समान है। एके्द्रिरय से बेइ्द्रिरय की पुण्यवानी अनन्तगुणी होती है। जीवन में हमें जब कभी सेवा का मौका मिले सेवा करनी चाहिए। रमेश ओस्तवाल ने बताया कि सामूहिक पारणा रविवार को महावीर भवन में होंगे।