हृदय की पवित्रता ही धर्म का आधार है

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चेन्नई। यहाँ मैलापुर में बाजार रोड स्थित जैन स्थानक में चातुर्मासार्थ विराजित संतश्री कपिल मुनिजी म.सा. ने गुरुवार को अपने प्रवचन में कहा कि इमारत जितनी भव्य और विशाल होती है उसकी नींव भी उतनी गहरी होती है । जीवन की धरती पर धर्म की इमारत ख़डी करने के लिए मानवता की गहरी नींव चाहिए। जिस व्यक्ति का हृदय मानवता के सद्गुणों से शून्य है उस व्यक्ति के द्वारा किए गए धार्मिक क्रियाकलाप सार्थक परिणाम देने में समर्थ नहीं हैं। मुनिश्री ने कहा कि हृदय की पवित्रता ही धर्म का आधार है अत: व्यक्ति को अपने हृदय को शुद्ध बनाना चाहिए। हृदय की मलिनता धर्म की तेजस्विता को ख़त्म कर देती है। जीवन में मार्गानुसारी के ३५ बोल के महत्त्व को बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि इसमें वर्णित सूत्र जीवन के स्तर को उच्चतम बनाने में सक्षम हैंै। धर्म की साधना करने के पूर्व मानवता के सद्गुणों का विकास बेहद जरुरी है। मानवता की नींव पर ही धार्मिकता का महल ख़डा होता है। मुनिश्री ने कहा कि गृहस्थ जीवन में धन की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। अर्थ के बिना सब व्यर्थ है। मगर धन का उपार्जन न्याय नीति से होना चाहिए। अन्याय से अर्जित धन जीवन में मुसीबतों की फौज लेकर आता है। जो व्यक्ति पापकर्म करके धन कमाते हैं उनका यह लोक शोक और दुखमय होता है और परलोक में नरक आदि दुर्गति के मेहमान बनते हैं। इस सत्य को दृष्टि के समक्ष रखकर ही जीवन के स़फर को तय करना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि आज आकृति के मनुष्य तो सभी हैं मगर प्रकृति के मनुष्य मिलना बेहद कठिन है। इंसान का इंसान बने रहना भी एक ब़डी साधना है। वही व्यक्ति सुखी होता है जिसके मन में निर्भयता है। निर्भयता आती है न्याय नीति के पथ पर चलने से। अत: जीवन की डोर न्याय नीति से बंधी होनी चाहिए। जीवन में न्याय और नीति के प्रति निष्ठा और विश्वास पैदा करने के लिए ही हेमचंद्राचार्य ने मार्गानुसारी के ३५ सूत्रों की रचना करके मानव समाज के ऊपर महान अनुग्रह किया है। एक सद्गृहस्थ बनने के इच्छुक व्यक्ति को इन सूत्रों की समझ बेहद जरुरी है। इस मौके पर प्रतिभा बैद ने १३ की तपस्या अंगीकार की। इस मौके पर ब़डी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित थे। धर्मसभा का संचालन संघमंत्री विमलचंद खाबिया ने किया।