-कोरोना वायरस को हराकर स्वस्थ घर लौटे कुणाल गन्ना की आपबीती

– कहा, फाइव स्ट्राट ट्रीटमेन्ट उपलब्ध करा रही है सरकार

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। ‘आइसोलेशन कोई जेल नहीं, अपितु अपनों को कोरोना बीमारी से बचाने का सबसे कारगार तरीका है। आइसोलेशन एक एहतियात, सावधानी व सोशल डिस्टेंसिंग है जो कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति को संक्रमण से बाहर आने में, अर्थात स्वस्थ होने में मदद करती है।’ यह विचार बेंगलूरु निवासी सुरेश गन्ना के पुत्र कुणाल गन्ना के हैं, जो गत दिनों कोरोना महामारी को मात देकर 22 दिन के आइसोलेशन के बाद स्वस्थ होकर अपने घर लौटे हैं। कुणाल एक 21 वर्षीय स्मार्ट, उच्च शिक्षा प्राप्त युवक हैं।

कुणाल गत 17 मार्च को स्कॉटलैंड से वाया लंदन होकर स्वदेश लौटे थे। गन्ना स्कॉटलैंड में पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई कर रहे थे परन्तु जब यूके में कोरोना महामारी फैलने लगी तो उन्होंने अपने दोस्तों के साथ भारत अपने अपने घर आने का निर्णय किया। वह अपने एक दोस्त के साथ 17 मार्च को बेंगलूरु पहुंचे थे। कुणाल गन्ना ने बताया कि बेंगलूरु पहुंचकर एयरपोर्ट पर उनकी थर्मल जांच हुई जिसमें वह कोरोना नेगेटिव पाए गए थे। जब वह घर पहुंचे तो घर आकर अपने पापा, मम्मी व बड़े भाई से कुछ क्षण के लिए मिलकर उन्होंने एहतियातन अपने आप को घर के एक कमरे में बंद कर क्वारंटाइन कर लिया था।

इस दौरान भारत में भी कोरोना पांव पसारने लगा था। क्वारंटाइन में रहते हुए कुणाल गन्ना को कुछ असहज व टेंशन महसूस होने लगा तो उनकी माता ने उन्हें एक बार कोरोना टेस्ट कराने की सलाह दी। माता की सलाह पर कुणाल ने 19 मार्च को मल्लेश्‍वरम स्थित केसी जनरल अस्पताल में जांच करवाई, तब भी उनका शुरुआती टेस्ट नेगेटिव ही आया परन्तु 20 मार्च को अस्पताल से फोन आया कि उनका टेस्ट पॉजिटिव पाया गया है।

डाक्टरों ने उन्हें फोन पर केसी जनरल अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड में रहने की सलाह दी जिसे कुणाल ने तुरंत मान लिया क्योंकि पहले क्वारंटाइन के दौरान कुणाल ने कोरोना व आइसोलेशन के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर ली थी।उन्हें मालूम था कि पूरी सावधानी बरती गई तो कोरोना को हराया जा सकता है। 20 मार्च को कुणाल केसी अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में 14 दिन के लिए भर्ती हो गए।

कुणाल से सम्पर्क में आए उनके पिता सुरेश गन्ना व उनके बड़े भाई को भी सावधानी बरतते हुए दो दिन आइसोलेट किया गया तथा उनके टेस्ट नेगेटिव आने पर उन्हें एक निजी होटल में क्वारंटाइन किया गया ताकि कोरोना की संभावना नगण्य हो जाए। कुणाल ने बताया कि आइसोलेशन एक प्रकार की चिकित्सा ही है जो कोरोना संक्रमण को रोक सकती है। कोरोना की कोई दवा तो है नहीं, केवल सावधानी ही कोरोना की दवा है।

कुणाल ने बताया कि किसी भी बड़ी से बड़ी बीमारी से स्वस्थ हुआ जा सकता है, जिसके लिए बहुत जरूरी है सही समय पर सही इलाज व अच्छे डाक्टरों का परामर्श। इसके अलावा अपनों का साथ, गुरुओं का आशीर्वाद हमें संबल प्रदान करता है। कुणाल ने कहा कि वह बहुत खुशकिस्मत हैं कि उन्हें यह सभी चीजें समय रहते हुए मिलीं और आज वह कोरोना विनर बन पाए।

कुणाल ने केसी जनरल अस्पताल में बिताए 22 दिन के आइसोलेशन काल के बारे में बताते हुए कहा कि आइसोलेशन वार्ड में किसी भी प्रकार की कोई बंदिश नहीं थी। वह बिल्कुल सामान्य मरीजों की तरह से थे बल्कि इस दौरान उन्हें मोबाइल, लैपटॉप चलाने को भी मिल रहा था। कुणाल ने आइसोलेशन में अपनी दिनचर्या बताते हुए कहा कि अस्पताल में 7 बजे उन्हें चाय-कॉफी व सुबह 9 बजे नाश्ता मिलता था। 9.30 बजे डाक्टर उनकी जांच करने आते थे तथा उन्हें एन्टीबायोटिक दवाई व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी पॉवर) बढ़ाने के लिए इंजेक्शन व दवाई दी जाती थी। रोजाना 10 बजे मनोचिकित्सक का फोन आता था तथा मनोचिकित्सक फोन पर उनकी मनोस्थिति, उनके व्यवहार, तनावस्तर आदि की जानकारी लेकर उन्हें हमेशा सकारात्मक रहने की सलाह देते थे। दोपहर में 1 बजे स्वादिष्ट व पौष्टिक भोजन दिया जाता था।

कुणाल ने बताया कि आइसोलेशन वार्ड में घूमने की उन्हें पूरी आजादी थी, बस सोशल डिस्टेंसिंग व सावधानी बरतना जरूरी था। वह अपने साथ में रहने वाले अन्य संक्रमित मरीजों से बातचीत करते थे। आइसोलेशन वार्ड में हर समय मास्क पहनना जरूरी होता था। उन्होंने बताया कि आइसोलेशन के दौरान उनके फेफड़ों का एक्स-रे, रक्त जांच, पेशाब जांच व अन्य सामान्य जांच ही की गई। कोई लम्बी चिकित्सा न होने के कारण केवल मोबाइल व लेपटॉप पर फिल्म व वेबसिरीज देखना ही टाइमपास का एकमात्र जरिया था जिसका उन्होंने पूरा लाभ उठाया।

शाम 5 बजे फिर चायकाफी तथा 8 बजे खाना मिलता था। रात करीब 8.30 बजे एक बार फिर डाक्टर उनकी पूरी जांच करते थे तथा आवश्यकतानुसार दवाई देते थे। उन्होंने कहा कि डाक्टर भी पूरी एहतियात बरतते हुए एस्ट्रोनॉट की तरह पूरी कवर्ड ड्रेस पहनकर व सिर पर हेडगियर लगाकर ही उनकी जांच करते थे। उन्होंने बताया कि उनके वार्ड में सबसे युवा कुणाल ही थे। उनके अलावा अन्य तीन मरीज उनसे अधिक उम्र के ही थे।

कुणाल गन्ना ने कहा कि आइसोलेशन कोई कैदखाना नहीं, केवल अपने आप को एकांत में रखने का तरीका है। केसी अस्पताल में उन्हें बहुत फाइवस्टार ट्रीटमेन्ट मिला, सातों दिन 24 घंटें चिकित्सा टीम उनकी देखरेख में रहती थी। आइसोलेशन के दौरान डाक्टरों का रवैया भी बहुत ही सकारात्मक था जो कि स्वस्थ होने का एक बड़ा कारण बना।

गन्ना ने बताया कि उगादि के दिन सभी डाक्टरों व नर्सों ने उन सभी संक्रमित रोगियों को व्यक्तिगत रुप से उगादि की शुभकामनाएं दी, कुल मिलाकर सब कुछ अच्छा रहा। कुणाल ने कहा कि कोरोना से डरना नहीं चाहिए, यदि कुछ संशय हो तो सबसे पहले अपनी जांच करा लेनी चाहिए जिससे मन का वहम खत्म हो जाए। जो व्यक्ति डटकर इस वायरस का सामना करता है, वायरस उसका पीछा सबसे पहले छोड़ता है। कुणाल को 11 अप्रैल को आइसोलेशन वार्ड से छुट्टी मिल गई और वह संक्रमण रहित स्वस्थ होकर घर आ गए। कुणाल घर आकर भी 2 सप्ताह के लिए क्वारंटाइन पर हैं।

कुणाल गन्ना के पिता सुरेश गन्ना राजस्थान के भीलवाड़ा मूल के जैन तेरापंथ समुदाय के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। चिकपेट स्थित सी.टी. स्ट्रीट में एसके ज्वेल्स नामक उनका आभूषण प्रतिष्ठान है।