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स्वाध्याय प्रेमी, धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य पारायण आदि गुणों की धारक थीं माणिकबाई: समणीश्री
गुणानुवाद सभा के पश्‍चात रमेश सियाल व सियाल परिवार के अन्य सदस्यों ने अनेक त्याग, व्रत, प्रत्याख्यान ग्रहण कर सच्ची श्रद्धांजलि दी
 
इस गुणानुवाद सभा में अनेक श्रावक श्राविकाओं व सियाल परिवार के सदस्यों ने माणिकबाई का गुण स्मरण किया।

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। जैन संत डॉ. मुनि पद्मचन्द्रजी म.सा. की शिष्टा समणी निर्देशिका डॉ सुयशनिधिजी के सान्निध्य में 11 दिन के संथारे के पश्‍चात तपस्वी माणिकबाई सियाल की स्मृति में गणेश बाग में गुणानुवाद सभा को आयोजन किया गया। 

इस मौके पर समणी सुयशनिधिजी ने कहा कि जैन दर्शन जीवन जीने की कला सिखाने के साथ साथ मुत्यु को महोत्सव बनाने की कला सिखाता है। जब मृत्यु निकट हो, उस समय व्रतधारी साधक प्रीतिपूर्वक संलेखना को स्वीकार करते है। 

डॉ. समणी ने कहा कि माणिकबाई सियाल का जीवन तपोमय था। 38 वर्ष की निरन्तर वर्षीतप की आराधना करते हुए अंतिम साधना के लिए 27 सितम्बर को उन्होंने संथारा ग्रहण किया था। निरंतर 11 दिन तक समणीवृन्द ने धर्मध्यान श्रवण कराते हुए उनके संलेखना में आत्मसमाधि की अभिवृद्धि करवाई। माणिकबाई स्वाध्याय प्रेमी, धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य पारायण आदि गुणों की धारक थीं।  

इस गुणानुवाद सभा में अनेक श्रावक श्राविकाओं व सियाल परिवार के सदस्यों ने माणिकबाई का गुण स्मरण किया। तत्पश्‍चात साध्वीश्री रुचिकाश्री ने एक श्राविका के परिवार के प्रति रहे हुए दायित्व को बताते हुए माणिकबाई के जीवन को सराा। गुणानुवाद सभा के पश्‍चात रमेश सियाल व सियाल परिवार के अन्य सदस्यों ने अनेक त्याग, व्रत, प्रत्याख्यान ग्रहण कर सच्ची श्रद्धांजलि दी।

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