'शोले' का एक पोस्टर
'शोले' का एक पोस्टर

मुंबई/भाषा। निर्देशक रमेश सिप्पी का कहना है कि आज से 45 साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘शोले’ में मुख्य किरदार जय-वीरू और ठाकुर के लिए पहले फौजी की भूमिका तय की गई थी और फिल्म का अंत भी अलग होना था। ‘अंदाज’ और ‘सीता और गीता’ जैसी फिल्में बनाने के बाद सिप्पी हॉलीवुड जैसी ऐक्शन फिल्म बनाना चाहते थे। संयोगवश, लेखकों सलीम खान और जावेद अख्तर ने उन्हें शोले की कहानी सुनाई।

सिप्पी ने कहा कि जब उन्हें कहानी सुनाई गई तो उन्हें दो फरार युवकों और उनके द्वारा उस ठाकुर की सहायता करने का विचार अच्छा लगा जिसके परिवार को डकैतों ने मार डाला था। सिप्पी ने कहा, किरदार बाद में ध्यान आए लेकिन मुख्य कहानी वही रखनी थी। हम जय और वीरू को सेना का जवान दिखाना चाहते थे और ठाकुर को सेना का अफसर। बाद में ठाकुर को पुलिस वाला बनाया गया।

उन्होंने कहा, मूल विचार दो फरार युवकों (जय और वीरू) और वह ठाकुर की भावनात्मक कहानी से कैसे जुड़ते हैं, इसको लेकर था। एक के बाद एक सारे किरदार सामने आ गए। जैसे पटकथा बढ़ती गई सभी किरदारों में जान आ गई।शोले के निर्माण में दो साल से कुछ अधिक का समय लगा। शूटिंग तीन अक्टूबर 1973 को शुरू हुई और 15 अगस्त 1975 को फिल्म रिलीज हुई। निर्देशक ने कहा कि उन्हें पता था कि उनके हाथ में एक अच्छी फिल्म है।

उन्होंने कहा, हमें लगा कि हम अच्छी फिल्म बना रहे हैं लेकिन यह नहीं पता था कि 45 साल बाद भी लोग इस फिल्म की बात करेंगे। सभी ने अपना पूरा योगदान दिया। लेकिन फिल्म को इतना प्यार मिलेगा यह हमने नहीं सोचा था। शोले उन दुर्लभ कहानियों में से एक है जिसका खलनायक गब्बर सिंह अदाकार चुने जाने के समय से ही चर्चा में रहा।

सिप्पी ने कहा कि इस रोल के लिए धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और संजीव कुमार तक अपना हीरो का किरदार छोड़ना चाहते थे लेकिन फिरोज खान की फिल्म धर्मात्मा करने के लिए जब डैनी डेंजोगप्पा ने यह रोल छोड़ दिया तब अमजद खान से गब्बर का किरदार निभा कर इसे अमर कर दिया। सलीम-जावेद ने गब्बर की भूमिका के लिए खान का नाम सुझाया था।