आंखों की देखभाल आवश्यक

सुरमों का प्रयोग आंखों की चिकित्सा की दृष्टि से चार प्रकार का होता है।

आंखों के अभाव में जग सूना हो जाता है। इस सुरम्य मनभावन विश्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मानव जीवन में नेत्र प्रमुख अंग हैं, जो प्रकृति का अवलोकन करवाते हैं। नेत्र की महत्ता को ध्यान में रखते हुए प्रकृति ने भी इसकी सुरक्षा में एक नहीं दो-दो सुरक्षा कवच प्रदान किए हैं।१. मस्तिष्क की हड्डी तथा २. पलक, जो हर क्षण विषम स्थिति में नेत्रों की रक्षा करती रहती हैं। आदिकाल से ही जन-जन में आंखों की सुरक्षा हेतु विभिन्न प्रयोग भारतीयता में रचे बसे हैं। सुंदर नेत्र मनुष्य की गंभीरता को उजागर करते हैं। शृंगार में आंखों का शृंगार अति महत्वपूर्ण होता है।८ वर्तमान युग की भाग-दौ़ड के कारण आंखों की सुरक्षा के बारे में मनुष्य कम से कम समय निकालता है तथा लाचार होने पर ही आंखों की ओर ध्यान देता है। इस सबके साथ ही ब़ढते हुए धुआं, धूल, विभिन्न गैसीय प्रदूषण, टीवी से निकलने वाली तीव्र किरणों, विभिन्न वातावरणीय तीव्र प्रकाश किरणों आदि से भी नेत्र रोगों में निरंतर ब़ढोत्तरी हो रही है।८ इसके अतिरिक्त आंखों में प्रतिदिन काजल डालना, सुरमा डालना आदि, जो मात्र चेहरे की सुंदरता का ही प्रतीक नहीं था, अपितु नेत्र रक्षा का प्रधान उद्देश्य था, की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है। इसके अलावा निरोगी नेत्रों पर प्रतिदिन सुरमा लगाया जाता है। फूला तथा ब़ढे हुए मांस में आयुर्वेद की चन्द्रोदयवटी बकरी के दूध अथवा शहद में घिसकर रात को सोते समय प्रतिदिन लगानी चाहिए। ८ आंखें दुखने (आने) पर गुलाब जल में फिटकरी डालकर आंखें धोते हैं तथा पलाश की ज़ड (खाखरा टेसू ढाक) का अर्क डाला जाता है। इससे दुखती आंखों के घाव ठीक हो जाते हैं।८ मोतियाबिंद में चन्द्रोदयवटी अथवा रसान्जन को बकरी के दूध में अथवा शहद में घिसकर लगाते हैं। गाय का घी आंखों में डालने से लाभ होता है तथा मलाई भी लगाई जाती है।८ आंजने के लिए मुख्यतया पांच प्रकार की सलाखें काम में ली जाती हैं। सोना, चांदी, तांबा, लोहा एवं अंगुली। इसके अतिरिक्त सींग, हाथी दांत तथा कांसे आदि की सलाखें भी काम में ली जाती हैं। यह सलाख ८ से १० अंगुल लम्बी, मध्य में कुछ पतली, अत्यंत चिकनी, साफ तथा पुष्प की कली के आकार की व मटर के दाने के समान गोल हो। ध्यान रहे कि सलाख के मुंह तीखे न हों।८ इन सब सलाखों में अंगुली ही प्रधान है, क्योंकि वह मुलायम होती है। बच्चों की आंखों में तो अंगुली से ही काजल लगाना चाहिए। बच्चे के हिलने-डुलने से धातु की सलाख से घाव अथवा आघात लगने का भय रहता है।

1. जब आंखों में फू ला तथा मांस बढ़ जाता है। 2. आंखों के आने (दुखने) पर। 3. मोतियाबिंद में, 4. आंखों के परदे पर होने वाले घातक प्रभाव  के समय।