सूरज यादव अपने १० साल के बच्चे गणेश के बर्ताव से काफी परेशान थे। छोटी-छोटी बात पर जिद्द और मनमानी करने की गणेश की आदत की वजह से उसकी प़ढाई तो प्रभावित हो ही रही थी, साथ ही परिवार की समस्याएं भी ब़ढ रही थीं। बात जब काफी ब़ढ गई तो सूरज अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले गए।कुछ दिन इलाज के बाद भी जब बच्चे के बर्ताव में कोई बदलाव नहीं आया तो डॉक्टर ने उसे मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह दी। यहां पता चला कि गणेश की मनमानी और जिद्द के पीछे एक मानसिक समस्या है।यह मामला सिर्फ गणेश का नहीं है। गणेश जैसे कई बच्चे इस समस्या से परेशान हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में इलाज के लिए उनके परिजन आगे नहीं आ पाते। जेजे हॉस्पिटल के मनोचिकित्सक भरत डीयू ने कहा, जो बच्चे ब़डों की बात नहीं सुनते, बात-बात पर गुस्सा होते हैं और बार-बार वही काम करते हैं जिसके लिए उन्हें मना किया जाता है तो साइकेट्री में इसे ऑपोजिशनल डिफायंट डिसऑर्डर (ओडीडी) कहते हैं। इस समस्या से परेशान २०-२५ बच्चे हर महीने हमारे पास आते हैं।द्धढ्ढणक्क फ्·र्ैंत्रर्‍ ब्स् फ्द्बडद्भय्विशेषज्ञों के अनुसार, ओडीडी का समय पर उपचार न हो तो यह गंभीर रूप ले सकता है और आगे चलकर उनमें असामाजिक तत्वों वाले लक्षण आ सकते हैं। ओडीडी में जहां बच्चे अपनी मनमानी करते हैं, वहीं कंडक्ट डिसऑर्डर में यह बेवजह इंसान या जानवरों को नुकसान पहुंचाते हैं। बहुत अधिक गुस्सा करने के साथ ही झूठ बोलना और स्कूल जानबूझकर न जाना धीरे-धीरे इनकी आदत बन जाती है। मनोचिकित्सक डॉ. सागर मूंद़डा ने कहा कि बच्चों में होने वाली ये समस्याएं सामान्यत: आनुवांशिक होती हैं। हालांकि वातावरण का असर भी काफी हद तक उन्हें प्रभावित करता है।द्म ·र्ैंद्यष्ठ्र ृद्मख्रष्ठक्वर्‍मनोचिकित्सकों के अनुसार, बच्चों में इन समस्याओं की जितनी जल्दी पहचान कर ली जाए उतना अच्छा होता है। अगर समस्या ओडीडी स्तर पर है तो इसे काउंसलिंग और घर के सकारात्मक वातावरण से सही किया जा सकता है। लेकिन, अगर यह कंडक्ट डिसऑर्डर तक पहुंच जाती है तो काउंसलिंग के साथ ही दवाइयों की भी जरूरत प़डती है। ऐसा भी देखने को मिलता है जब समय पर उपचार न मिलने से यह समस्या ऐंटी सोशल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (एसपीडी) में बदल सकता है। जो आगे चलकर असामाजिक कार्यों में लग जाते हैं। ख्रुडफ्य् ृ्यथ्·र्ैं, थ्स्द्भश्च ·र्ैंद्ब बच्चों में होने वाली मानसिक समस्याओं में अटेंशन डेफिसिट हायपरऐक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) भी एक आम समस्या है। जिन बच्चों में इसकी शिकायत होती है उनमें एकाग्रता के साथ ही चीजें भूलने की आदत देखने को मिलती है। एडीएचडी के बच्चों का अपने दिमाग और शरीर पर नियंत्रण नहीं रहता। इसके कारण ये कुछ न कुछ हमेशा करते रहते हैं। इनमें गुस्सा अधिक होने के साथ ही धैर्य की कमी होती है। नतीजतन कुछ भी उनके अनुसार नहीं हुआ तो वह सामान तो़डने के अलावा चीजों को फेंकने भी लगते हैं। इनमें चंचलता भी बहुत अधिक होती है। केईएम हॉस्पिटल से मिली जानकारी के मुताबिक, हर महीने २५-३० एडीएचडी से पीि़डत बच्चों के अभिवावक उन्हें उपचार के लिए लाते हैं।