क्या है आपके शरीर की प्रकृति?

फोटो स्रोत: PixaBay
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नई दिल्ली/दक्षिण भारत। शरीर के प्रकार या प्रकृति आयुर्वेद की सबसे मौलिक और अनूठी अवधारणाओं में से एक है। यह कहता है कि प्रत्येक मानव शरीर अलग है। तो प्रकृति क्या है? रसवैशेषिक कहता है, ‘जन्ममरणान्तरालभाविनी अविकारणी दोषास्थिति प्रकृतिः।’ जन्म और मृत्यु की अवधि के बीच मन / शरीर पर शासन करने वाली त्रुटिरहित दोष स्थिति को प्रकृति कहा जाता है। इन दोषों का सापेक्ष प्रभुत्व प्रकृति का निर्माण करता है। यह बाइनरी कोड के समान है, जहां दो नंबर पूरे प्रोग्राम बनाते हैं।

आयुर्वेद शरीर प्रकार या प्रकृति
हममें से ज्यादातर लोग शरीर प्रकृति के बारे में जानते हैं जो शारीरिक दोष (वात, पित्त और कफ) से निकलती है। लेकिन प्रकृति का एक मनोवैज्ञानिक पहलू है। शरीर में प्रकृति की दो परतें होती हैं – मानसिक, शारीरिक।

मानसिक धरातल पर, प्रकृति या मन के 3 प्रकार होते हैं – सात्विक (संतुलित), राजसिक (अतिसक्रिय), तामसिक (निष्क्रिय)। भौतिक धरातल पर, फिर से हमारे पास तीन प्रकार की प्राथमिक प्रकृति हैं – वात, पित्त, कफ।

हालांकि, मानसिक और शारीरिक प्रकृति के बीच कोई कड़ा संबंध नहीं है। एक सात्विक व्यक्ति की वात, पित्त या कफ प्रकृति हो सकती है। और यह नियम हमारे समाज में कई तरह के लोगों के लिए अनुमति देता है।

आयुर्वेद कहता है कि मन शरीर का स्रोत है। शरीर मन से एक दर्पण पर प्रतिबिंब की तरह उभरा। इसलिए, हमारे शरीर उतने ही अलग हो सकते हैं जितने हमारे मन हैं! और मानसिक धरातल पर दोष शारीरिक धरातल पर दोष को प्रभावित करता है। आइए, इस आलेख में हम भौतिक प्रकृति पर ध्यान ​दें।

भौतिक प्रकृति कैसे बनती है?
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद् दोष उत्कटः।
प्रकृतिर्जायते तेन …।
सुश्रुत संहिता – शरीर स्थान 4/63

शुक्राणु और अंडाणु के मिलन के दौरान जो भी दोष मुख्य रूप से सक्रिय होता है, वह बच्चे के शरीर के प्रकार या प्रकृति का निर्माण करता है। इसलिए, यदि गर्भाधान के दौरान वात दोष प्रमुख है, तो बदले में शिशु में वात प्रधान प्रकृति होगी।

भौतिक प्रकृति के प्रकार
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, प्रकृति के तीन मूल प्रकार हैं – वात, पित्त, कफ। लेकिन ये प्राथमिक प्रकृति आगे दोहरी और तिहरी दोष प्रकृति में विभाजित की गई हैं। उदाहरण के लिए – वात पित्त – इस उपप्रकार में वात प्रधान बल है और पित्त उपबल दोष है।

तिहरी प्रकृति विश्लेषण में, तीनों दोषों की स्थिति मानी जाती है, उदाहरण के लिए – वात पित्त कफ या पित्त वात कफ। यहां, पहला दोष प्रमुख शक्ति है जो चयापचय को निर्देशित करता है, उप-दोष कुछ कार्यों को नियंत्रित करता है और पश्‍चगामी दोष शायद ही कभी पूर्ण रूप से व्यक्त किया जाता है।

इसलिए, हम पहले दोष की कल्पना महाप्रबंधक, उप-दोष की सहायक प्रबंधक और पश्‍चगामी दोष की कल्पना सहायक प्रबंधक के सचिव के तौर पर कर सकते हैं। तदनुसार, वे निर्णय लेने में अपना प्रभाव डालते हैं।

आयुर्वेद शरीर प्रकार या प्रकृति का महत्व
यह सापेक्ष प्रभुत्व एक व्यक्ति में चयापचय गतिविधि, इसकी दर और दक्षता का फैसला करता है। जैसे कि बाइनरी कोड किसी भी कंप्यूटर प्रोग्राम के लिए आधार है; प्रकृति शरीर या शरीर के अंदर होने वाली हर चीज का आधार है।

प्रकृति आपकी उपस्थिति, पाचन, आपकी त्वचा, बाल और यहां तक कि आपकी सोचने की क्षमता, स्मृति और भावनाओं को भी तय करती है! यहां शरीर पर प्रकृति के कुछ परिभाषित प्रभाव दिए गए हैं –

स्पष्ट बाहरी विशेषताएं
प्रत्येक प्रकृति व्यक्ति को अलग-अलग शारीरिक विशेषताएं प्रदान करती है। उदाहरण के लिए –

भौतिक स्वरूप –
वात प्रधान लोग आमतौर पर पतले होते हैं;
पित्त प्रधान लोग पुष्ट होते हैं, और
कफ प्रधान लोग भारी शरीर वाले हो सकते हैं।

त्वचा
वात प्रधान लोगों को सूखी त्वचा और खुजली हो सकती है।
पित्त से पीड़ित लोग लालिमा वाले, तैलीय त्वचा के कारण मुंहासे, झुर्रियां, धब्बे युक्त आदि हो सकते हैं।
कफ प्रधान लोगों की त्वचा चमकदार, चिकनी और स्पष्ट हो सकती है। हालांकि, उन्हें सुन्नता या सिहरन का अनुभव होता है।

बाल
वात प्रधान लोगों के बाल शुष्क और छल्लेदार होने के साथ झड़ सकते हैं।
पित्त प्रधान लोगों के घुंघराले बाल होते हैं जो जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं।
कफ प्रधान लोगों के बाल घने और मजबूत होते हैं। वे बालों की समस्याओं का कम से कम सामना करते हैं।

त्वचा, बाल, अंग, आंख और पूरे शरीर के संबंध में कई अन्य विशेषताएं हैं जो प्रमुख दोष को दर्शाती हैं।

(डॉ. कनिका वर्मा प्रसिद्ध आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं। उनके इस आलेख का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद राजीव शर्मा ने किया है।)