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किसानों के बाद अब साधु-संतों ने किया आंदोलन का ऐलान
मठ-मंदिरों के लिए सरकारी 'कब्जे' से मुक्ति की मांग
 
उन्होंने रूपरेखा का जिक्र करते हुए कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब यह मामला सुलझ जाएगा। हालांकि अभी किसान कुछ और मांगें कर रहे हैं। वहीं, साधु-संतों ने भी घोषणा कर दी है कि वे आंदोलन करने जा रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर थोड़े-से किसान सरकार से अपनी मांगें मनवा सकते हैं तो वे क्यों नहीं! अब देखना यह होगा कि सरकार उनकी मांगों पर क्या प्रतिक्रिया देती है।

बता दें कि रविवार को देश के विभिन्न राज्यों से आए साधु-संत दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मंदिर में इकट्ठे हुए। इसके साथ ही उन्होंने आंदोलन का ऐलान कर दिया, जो सरकारी 'कब्जे' से मठ-मंदिरों की मुक्ति के लिए है। संतों का कहना है कि वे ​केंद्र और राज्य सरकारों के सामने अपनी मांगें शांतिपूर्वक ही रखेंगे। अगर वे नहीं मानी गईं तो 'शस्त्र' भी उठाएंगे। 

दिल्ली में डालेंगे डेरा
ये साधु-संत कई अखाड़ों, आश्रमों और मठों से थे। उनके 'क्रांतिकारी' तेवर देखकर लगता नहीं कि वे जल्द ही लौट जाएंगे। उनका कहना है कि जब किसानों ने रास्ता रोककर अपनी मांगें मनवा लीं तो वे ऐसा क्यों नहीं कर सकते! उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वे भी ऐसा करेंगे और किसानों की तरह दिल्ली में डेरा डालेंगे। 

ऐसे में सरकार के लिए एक और आंदोलन से निपटने की चुनौती होगी। चूंकि देशभर में जनता साधु-संतों के प्रति सम्मान का भाव रखती है। लिहाजा इस बात की भरपूर संभावना है कि उन्हें जनता का समर्थन मिल जाए। 

क्या बोले साधु-संत?
आंदोलन से पहले यह कार्यक्रम अखिल भारतीय संत समिति की ओर किया गया था। इसके अध्यक्ष महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत हैं जो 'विश्व हिंदू महासंघ' के राष्ट्रीय अंतरिम अध्यक्ष भी हैं। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ हैं जो उप्र के मुख्यमंत्री भी हैं। साधुओं को विश्वास है कि यह आंदोलन सफल होगा और सरकार को उनकी मांगें माननी पड़ेंगी।

साधु-संतों की मानें तो उनके इस आंदोलन को राम मंदिर आंदोलन जितना लंबा चलाने की नौबत नहीं आएगी, चूंकि अब 'आस्तिक लोगों' की सरकार है और 'नास्तिक लोग' सत्ता से दूर हैं। उन्होंने रूपरेखा का जिक्र करते हुए कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा, जिससे कि नई सरकार के सत्ता में आने पर सबसे पहले मठ-मंदिरों को सरकार के कब्जे से मुक्त कराने का कानून बनाया जा सके।

जागरूकता का आ​ह्वान
संतों ने आरोप लगाया कि तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और केरल के मंदिरों की स्थिति सर्वाधिक चिंतनीय है। उन्होंने उत्तराखंड के देवस्थानम बोर्ड पर भी निशाना साधा। संतों ने हिंदू समाज में धर्म को लेकर जागरूकता का आह्वान किया। साथ ही भगवान श्रीराम के जयकारे के साथ आंदोलन को सफल बनाने के लिए प्रतिज्ञा भी कराई।

प्रधानमंत्री को पत्र
महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत ने जानकारी दी कि विस्तृत दस्तावेज के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ​पत्र भेजा जाएगा। अगर उनकी मांगें मान ली गईं तो वे प्रधानमंत्री को धन्यवाद भी कहेंगे। अगर मांगें पूरी नहीं हुईं तो उस स्थिति में आंदोलन छेड़ा जाएगा। इसके लिए जनजागरण करेंगे और देश के गांव-शहरों में जागरण की मशाल लेकर जाएंगे। साधु-संत राष्ट्रीय राजधानी के विभिन्न मार्गों पर धूनी रमाएंगे और जरूरत पड़ने पर आखिर में शस्त्र भी उठाएंगे।

हिंदुओं के आस्था केंद्रों के साथ 'अन्याय'
संतों ने मांग की है कि अन्य धर्म स्थलों की तरह मंदिरों को भी सरकारी कब्जे से मुक्त किया जाए। उन्होंने इसे हिंदुओं की आस्था के केंद्रों के साथ 'अन्याय' करार दिया है। 

विशेषज्ञों की मानें तो हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एनडाउमेंट एक्ट के अंतर्गत करीब 4 लाख मंदिर आते हैं। साल 1923 में मद्रास हिंदू रिलीजियस एनडाउमेंट एक्ट पारित किया गया था। वहीं, 1925 में हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एनडाउमेंट्स बोर्ड बना था। इसके प्रावधानों के अनुसार मंदिरों के चढ़ावे का विवरण सरकार के पास रहता था। सरकारें इसका इस्तेमाल करती रही हैं जिन पर सवाल उठे हैं। हालांकि बाद में इनमें कुछ सुधार भी हुए लेकिन संतों की मांग है कि अब यह स्वीकार्य नहीं है और मंदिरों, मठों से यह 'कब्जा' हटाया जाए।

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