देश की बेटी ने धरती से उपजाया सोना

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मजबूत हौसला, पक्का इरादा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी कामयाबी की नई इबारत

.. राजीव शर्मा ..

अक्सर कहा जाता है कि खेती तो घाटे का सौदा है, इसलिए लोग अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, कलेक्टर आदि तो बनाना चाहते हैं, बनाना भी चाहिए, लेकिन शायद ही कोई अपने बच्चों को किसान बनाना चाहेगा। आखिर इसकी वजह क्या है? आए दिन अखबारों में किसानों की आत्महत्या से जुड़ीं खबरें और दम तोड़तीं उम्मीदों के माहौल में ऐसा हौसला दिखाने वाले विरले ही मिलेंगे, जो कहें कि मेरी संतान किसान बनकर धरती से सोना उपजाएगी। अगर हम अमेरिका, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया और चीन जैसे देशों के किसानों की ओर देखें तो वे तुलनात्मक रूप से बहुत समृद्ध नजर आते हैं। इसकी वजह है वहां प्रचलित वैज्ञानिक खेती, व्यावसायिक मांग के आधार पर खेती।

आज हम आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ खेती-किसानी से कमाल करने वाली बेटी के बारे में बताएंगे जिसने अपने हौसले से कई लोगों को प्रेरित किया है।शुरुआत में उसे निराशा मिली, आसपास के लोगों ने मजाक भी उड़ाया लेकिन एक बार जब सफलता के अंकुर फूटने लगे तो उनके प्रयासों को गंभीरता से लिया जाने लगा। इनका नाम अनुपम कुमारी है। ये बिहार के सीतामढ़ी जिले की निवासी हैं, स्नातक की पढ़ाई कर चुकी हैं। इनके पिताजी खेती के अलावा शिक्षण कार्य भी करते थे लेकिन घर का गुजारा बमुश्किल चल पाता था। बाद में वे पूरा समय खेती को ही देने लगे।

हालांकि, अब भी मुश्किल हालात ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। इसकी वजह थी पुराने ढर्रे से खेती करना, जिसमें लागत बहुत ज्यादा थी और आमदनी नाममात्र की। एक दिन अनुपम ने पिताजी को राय दी कि हमें वैज्ञानिक तरीके से खेती करनी चाहिए, चूंकि विभिन्न देशों में कई किसानों ने इससे सफलता प्राप्त की है। पिता उनकी बात मान गए लेकिन अब सवाल यह था कि वैज्ञानिक खेती कैसे की जाए, कहां से इसकी विधि सीखी जाए। यह जानकारी हासिल करने के लिए अनुपम और उनके पिता कृषि अनुसंधान केंद्र गए।

यहां उन्होंने खेती का अनूठा संसार देखा। आधुनिक बीज, खाद, सिंचाई, कटाई, अधिक उत्पादन की विधियों से लेकर उन किसानों के बारे में जानकारी पाई जिनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण की वजह से खलिहान भरपूर पैदावार उगलने लगे। अनुपम ने मुख्यत: मशरूम और केंचुआ खाद के बारे में विस्तार से अध्ययन किया। साथ ही, खेती की और विधियां सीखने के लिए पटना से लेकर दिल्ली तक का सफर किया। अब समय था कुछ करने का, अपने बूते आगे बढ़ने का। अनुपम ने तय किया कि वे गांव में मशरूम की खेती करेंगी। इसके लिए कर्मभूमि बना उनका 500 वर्गफीट खेत और पूंजी लगाई सिर्फ 500 रुपए। गांव की एक लड़की मशरूम की खेती करेगी! बहुत लोगों को यह विचार पसंद नहीं आया, लिहाजा वे हतोत्साहित करने में जुट गए।

इन सबकी परवाह न करते हुए अनुपम कुमारी ने अपने मनोबल को मजबूत बनाए रखा। अब उनकी पहचान मशरूम बन चुका था। गांव के लोग मशरूम को स्थानीय भाषा में गोबरचट्टा कहते हैं। ऐसे में अनुपम का मजाक उड़ाने के लिए कहा जाता कि वे कोई खास काम नहीं कर रहीं, बस ‘गोबरचट्टा’ उगा रही हैं।अनुपम ने इन बातों को नजरअंदाज किया और लगातार अपने काम में जुटी रहीं। मेहनत रंग लाई। मशरूम की खेती से आमदनी होने लगी। तीन महीने बाद उनके हाथ में पूरे 10 हजार रुपए थे।

अब अनुपम बड़े स्तर पर मशरूम की खेती करती हैं और उनकी कमाई बढ़ती जा रही है। उन्होंने इसके अलावा केंचुआ खाद, मत्स्य पालन, गार्डनिंग का कार्य भी शुरू कर दिया है, जिसके शानदार नतीजे मिलने लगे हैं। अब गांव के लोग भी उनसे वैज्ञानिक खेती के गुर सीखने आते हैं। अनुपम ने यह साबित कर दिया कि हौसला मजबूत हो, इरादे पक्के हों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो तो हमारे देश की धरती सोना उगलती है।