समाज को समझना होगा कि फिजूलखर्चियों से दूर होकर और अच्छी परंपराओं को अपनाने से ही जीवन सुखमय होगा।
समाज को समझना होगा कि फिजूलखर्चियों से दूर होकर और अच्छी परंपराओं को अपनाने से ही जीवन सुखमय होगा।

पुरानी अच्छी परंपराओं को जीवंत करने का सही समय

श्रीकांत पाराशर
समूह संपादक
दक्षिण भारत राष्ट्रमत

कोई व्यक्ति कितना भी धनाढ्य हो, कितना ही रुतबे वाला हो परंतु कोरोना संकट से घबराहट सब में समान रूप से देखी गई। कोरोना ने भी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखा। उसके लिए भी अमीर गरीब सब समान थे, समान हैं। न कोई जाति सम्प्रदाय का भेदभाव, न कोई काले गोरे का अंतर। कोरोना ने देश में, देश में ही क्या, पूरे विश्व में ऐसी परिस्थितियां ला दीं कि गत दो अढाई महिने से सब की घिघ्घी बंधी हुई है। हमारे देश के हालात भी कोई ज्यादा अच्छे नहीं हैं। हम बस इतना कह सकते हैं कि हमारी कमीज अमेरिका, इटली और फ्रांस से ज्यादा सफेद है। मतलब, हम उनसे थोड़ी सी बेहतर स्थिति में हैं। वह भी कितने दिन बेहतर रहेंगे कहना मुश्किल है।

लाकडाउन में शुरू शुरू में प्रधानमंत्री के कदमों को कोसने वालों ने भी बाद के दिनों में अपने आपको अपने घर में कैद कर लिया। हर कोई “जान है तो जहान है” की रट लगाते दिखाई देने लगा। यह रट अभी भी जारी है क्योंकि कोरोना का संकट टला नहीं है। लाकडाउन हट गया है। अब लोग मुंह पर मास्क लगाए, हाथ में सैनीटाइजर की शीशी लिए महत्वपूर्ण कार्यों के चलते घर से निकल रहे ह़ै या दो पैसे की कमाई की जुगत में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान या कार्यालय में आकर बैठ रहे हैं। दुकान में भी ग्राहक तो आ नहीं रहे, विचार आ रहे हैं। इस समय सबसे ज्यादा व्यस्त है दिमाग। दिमाग में दिनभर विचार आते रहते हैं।

यह अच्छी बात है कि इन दिनों सब अच्छे विचार ही दिमाग में आ रहे हैं। इन अच्छे विचारों का एक उदाहरण है लोग शादी-ब्याह के आयोजन अब सादगीपूर्ण करने के बारे में सोचने लगे हैं। कुछ हद तक तो यह विचार परिस्थितियों की बाध्यता के कारण आ रहा है और कुछ कोरोना ने व्यक्ति की सोच में बदलाव लाने का काम भी किया है। फिलहाल तो ऐसे आयोजन में 50 से ज्यादा लोगों के शामिल होने पर पाबंदी है इसलिए चाहकर भी कोई क्या तामझाम करेगा? पैसा खर्च हो और कोई देखे भी नहीं तो “जंगल में मोर नाचा, किसने देखा” वाली स्थिति बन जाती है। पैसा खर्च करके जंगल में मोर कौन नचायेगा? दूसरी बात, बेसुमार पैसे वालों को भी एक बार तो कोरोना ने सोचने पर बाध्य कर दिया है कि पता नहीं भविष्य में क्या हालात बनें, इसलिए पैसे को अब संभालकर खर्च करने में समझदारी है।

अब कोई भी व्यक्ति यह सोचकर एक्स्ट्रा खर्च नहीं करता कि शादी कौनसी रोज रोज होती है, एक बार धूमधड़ाका कर लेते हैं, आने वाले साल-छह महीने अतिरिक्त मेहनत कर फिर कमा लेंगे। अब इस सोच में बदलाव आ गया है। साल छह महीने में जोर की कमाई की कोई गारंटी नहीं है। फिर खर्च करें तो क्या देखकर? कोई हिम्मत वाला व्यक्ति बादल देखकर घड़े फोड़ भी दे तो, तभी न जब बादल दिखें। अन्यथा जो घड़े में पानी है, उससे भी हाथ धोना पड़े और बारिश भी न हो तो फिर कैसी दुर्दशा हो? इसलिए अच्छी बात यह है कि विभिन्न समुदायों में शादी के आयोजन सादगीपूर्ण ढंग से करने पर गंभीरता से विचार होने लगा है।

अभी अभी अलवर राजस्थान में जैन समुदाय द्वारा विवाह आयोजनों को सादगीपूर्ण करने पर कुछ निर्णय लिए गए हैं, ऐसे समाचार हैं। जैन समाज के विभिन्न संगठन गहन चर्चा के बाद इस निर्णय पर पहुंचे हैं। बताया जा रहा है कि स्वागत समारोह में पीने के पानी सहित कुल अधिकतम 18 व्यंजन ही परोसे जाएंगे और बुफे के बदले पुरानी परंपरानुसार पंगत में बिठाकर भोजन कराने की वकालत की गई है। इसके पीछे पुराने, मनुहार कर के भोजन कराने के रिवाज को वापस लाने का प्रयास बताया जा रहा है। वैसे भी आने वाले लगभग एक बरस तक तो चाहे अनचाहे अघोषित लाकडाउन रह सकता है। आप यदि नाते रिश्तेदारों को बुलाएंगे भी तो संख्या सीमित होगी। इसके दो कारण हैं।

एक तो, जब तक कोरोना की रोकथाम के लिए कोई उचित दवा नहीं आ जाती है तब तक सरकार की ओर से बड़े आयोजनों के लिए कोई ज्यादा छूट मिलने के आसार नहीं हैं। इसलिए वैसे ही अतिथियों की संख्या सीमित रहेगी। दूसरी बात, जब तक दवा नहीं आएगी तब तक केवल आपकी मनुहार के भरोसे कोई भी ऐसे आयोजनों में शामिल नहीं होना चाहेगा। आप बुलाएंगे तब भी लोग नजरअंदाज करेंगे। इसलिए आयोजन छोटे स्तर पर होंगे तो प्रतिबंध लगाना और उनका पालन करना आसान होगा और हर कोई यही चाहेगा।

कहते हैं न, मौका भी है और दस्तूर भी। शादी आयोजनों को सरल, सादगीपूर्ण करने का सही समय यही है। न किसी को कोई उलाहना मिलने वाला है, न ही कोई श्रेय ले सकता है। हां, समाज स्तर पर जो संगठन पहले आगे आएंगे, उनको कुछ हद तक वाहवाही अवश्य मिलेगी। पहल करने वालों को मिलनी भी चाहिए। एक खास बात और आपको बता दूं। आजकल युवापीढी को भी आपके बड़े बड़े आयोजनों में कोई ज्यादा इंटरेस्ट नहीं है जहां आप हजारों की संख्या में समाज के लोगों को, अपने व्यापारिक क्लाइंट्स को बुलाते हैं। युवा अपने कुछ खास मित्रों और ज्यादा निकट के रिश्तेदारों की गेदरिंग में शादी के फंक्शन एंजॉय करना चाहते हैं।

मैं तो यह कहना चाहूंगा कि कारण चाहे कोरोना ही हो, हमारे जीवन में कुछ अच्छे के लिए यदि परिवर्तन आ रहे हों तो सबको आगे बढकर उनका समर्थन और सहयोग करना चाहिए। मैं तो इसमें कुछ और चीजें भी जोड़ना चाहूंगा कि जब बदलाव लाएं तो इन मुद्दों को न भूलें, जैसे प्री वेडिंग फोटो सेशन बंद हो, लड़कियों को मेहंदी मांडने के लिए बाहर से लड़के न बुलाए जाएं, संगीत संध्या के आयोजन केवल कुटुंबीजनों तक सीमित हों और बाहर से कोरियोग्राफर लड़कों को बुलाकर डांस न सीखें। सड़कों पर नाचना बंद हो। सौम्य सभ्य तरीकों से विवाह की वे सभी अच्छी रश्में फिर से शामिल की जाएं जिनकी तरफ हम तभी आकर्षित होते हैं जब वे किसी फिल्म या टीवी धारावाहिक में दिखाई देती हैं।

शादी के एक से बढ़कर एक बेहतरीन रीतिरिवाज हमारे पूर्वजों ने बनाए और निभाए, जिनमें मान सम्मान, मर्यादा सब कुछ शामिल था और मनोरंजन तो भरपूर था क्योंकि उस जमाने में मनोरंजन के और कोई साधन ही नहीं थे। सगे संबंधियों के साथ हंसी ठिठोली होती थी, मान सम्मान के नेगचार होते थे, मान मनुहार होती थी। अब तो बारात को ठहराने वाली होटल के नाम से, शादी के वेन्यू से, कैटरिंग का ठेका किसे दिया इससे, एक प्लेट कितने की पड़ी इससे व्यक्ति का रुतबा आंका जाता है। अब कोरोना ने जो जोर का झटका धीरे से दिया है, इसके कारण कुछ तो अच्छी पुरानी परंपराएं फिर से जीवंत होंगी। विवाह आयोजनों की जो ट्रैन पटरी से उतर गई थी, वह वापस पटरी पर आएगी, ऐसा मुझे लगता है। हो सकता है इसके लिए हम सबको अपने अपने स्तर पर प्रयास करने पड़ें।