निराशा के अंधकार के बाद उम्मीदों का सवेरा
निराशा के अंधकार के बाद उम्मीदों का सवेरा

श्रीकांत पाराशर
समूह संपादक, दक्षिण भारत

आज मनुष्य तनाव लिये घूमता है जबकि उसे पता है कि यह एक भयानक प्रवृत्ति है जो किसी खतरनाक रोग से कम नहीं है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि तनाव जब बढता जाता है तो इससे हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह, अवसाद, हृदय रोग, मनोरोग आदि होने की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। ऐसा नहीं है कि तनाव पालने का मनुष्य को कोई शौक होता है परंतु यह बात भी उतनी ही सच है कि इससे दूर रहने का वह कोई ईमानदार प्रयास भी नहीं करता। जीवन में घर-परिवार, मित्र, रोजगार सब कुछ होता है तो स्वाभाविक है कि इनमें तनाव का कहीं भी, कोई भी कारण बन सकता है।

ऐसा भी नहीं कि तनाव से बचने के लिए इन सबसे दूर रहना संभव है। इन सबके साथ रहते हुए दैनंदिन जीवन में छोटी छोटी न जाने कितनी बातें ऐसी होती हैं जो इतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं कि हम उन्हें अपने से चिपकने दें। उन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है परंतु हम करते नहीं। बल्कि ऐसी व्यर्थ की बातों को जाने अनजाने हम अपने दिमाग में भ्रमण का स्थान उपलब्ध करा देते हैं जबकि सच्चाई यह है कि तनाव हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है, हमारी जीवन शैली में यह कब प्रवेश कर जाता है इसकी भनक भी नहीं लगती और यह भयानक रोग का रूप ले लेता है। कई बार तो ऐसी स्थितियों से गहन अवसाद से गुजरते हुए व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेता है।

मनुष्य या तो इतनी बड़ी बड़ी महत्वाकांक्षाएं पाल लेता है जिनको पूरा करना उसके वश में नहीं होता और वह तनावग्रस्त हो जाता है या फिर वह अपनी महत्वाकांक्षा या लक्ष्य को जरूरत से ज्यादा बड़ा मान बैठता है जिससे वह पहाड़ की तरह विशाल दिखने लगती है और वह उससे निपटने में अपने आपको असमर्थ महसूस करने लगता है। जब व्यक्ति सफलता पाने में नाकाम होता है तो वह अवसाद के अंधकार में स्वतः चला जाता है और अंततः इसके परिणाम अच्छे नहीं आते। दरअसल मनुष्य को जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित कर लेना चाहिए, फिर उसको पाने के लिए सकारात्मक सोच के साथ आगे बढना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि लक्ष्य छोटा हो, मामूली हो जिसे यों फटाफट हासिल किया जा सकता हो और व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्त करने के बावजूद लगे कि उसने जीवन में कुछ उल्लेखनीय नहीं किया। परंतु लक्ष्य ऐसा भी न हो कि जिंदगी से जुआ खेलने की शर्त शामिल हो।

मैं यह मानता हूं कि मनुष्य को जीवन में अपनी क्षमताओं का श्रेष्ठ देने का प्रयास करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि सर्वश्रेष्ठ नहीं पा सके तो जीवन व्यर्थ चला गया। हम जिस मुकाम पर आज हैं, जिन परिस्थितियों में हैं उनसे बेहतर करने की कोशिश होनी चाहिए, भले ही वह सर्वश्रेष्ठ से कुछ कम ही क्यों न हो। जिंदगी को बोझिल बनाकर जीना कोई समझदारी नहीं क्योंकि आपकी जिंदगी कितनी अहम है, यह आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता। इसलिए जिंदगी को कैसे जीना है, यह केवल और केवल हम स्वयं पर निर्भर है। हम उसे सकारात्मक सोच और समझ के साथ खुशी खुशी बिता सकते हैं या बोझिल बना सकते हैं। निर्णय हमको ही करना होता है।

हमने जो कुछ जीवन में अपने परिश्रम से हासिल किया है उस पर गौरवान्वित होना चाहिए और संतोषभाव से आगे बढना चाहिए। ऐसा हो तो तनाव पास भी नहीं फटकेगा। व्यर्थ की महत्वाकांक्षाएं पालना, उन्हें पूरा करने के लिए कर्ज लेना, फिर कर्ज वापसी में बाधाएं आने से तनावग्रस्त होना कहां की बुद्धिमानी है? आप जिस मुकाम पर हैं उसका आनंद लें। परमात्मा को धन्यवाद दें कि आप न जाने कितने ही लोगों से बेहतर स्थिति में हैं।

ऐसी सकारात्मक सोच आपके जीवन में उल्लास भर देगी और आप अपने जीवन में अपनी सामान्य सामर्थ्य से कहीं ज्यादा अच्छा कर सकेंगे। यह जरूरी नहीं कि आपके पास खूब धन है तो आप तनाव से बचे रहेंगे। उस धन का सदुपयोग करना न आये तब भी आप तनाव से घिर सकते हैं। आप धन लुटाने की ऐसी तरकीबें ढूंढ लेंगे जो आगे चलकर आपके जी का जंजाल बन सकती हैं। इसलिए धन ज्यादा है तो उसको सही ढंग से खर्च करना भी आना चाहिए। उस धन से दूसरों को आर्थिक सहयोग किया जा सकता है। जरूरतमंदों की व्यवस्थित ढंग से मदद करने के तरीके ढूंढे जा सकते हैं जिससे धन का उचित उपयोग भी हो और मन को संतुष्टि भी मिले। इसलिए महत्वाकांक्षाओं का दायरा भी तय करना जरूरी है।

जिंदगी में तनाव के बहुत से कारण हो सकते हैं परंतु ऐसा नहीं कि उन कारणों का कोई समाधान नहीं है। नौकरी का न मिलना, नोकरी मिली है तो वहां काम का दबाव, अपनी आर्थिक स्थिति स्वयं की अपेक्षानुकूल ठीकठाक न होना भी तनाव का कारण हो सकता है। इसके अलावा प्रेम संबंधों में, पारिवारिक रिश्तों में किसी प्रकार की खटास तथा बेवजह अपनी खुद की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति से करना भी तनाव का कारण हो सकता है। प्रेम संबंधों और पारिवारिक संबंधों को समझदारी से सुलझाया जा सकता है। इसमें कुछ अपने ईगो और विचारों के साथ समझौते करने पड़ सकते हैं परंतु यह समझौते अच्छे पारिवारिक जीवन से ज्यादा महंगे नहीं होते। जहां तक दूसरों से खुद की तुलना कर स्वयं को हीनभावना से ग्रस्त करने की बात है, यह तो बहुत बड़ी बेवकूफी है। इसे इस रूप में देखना चाहिए कि आपमें भी बहुत सी खासियतें हैं जो उस व्यक्ति में नहीं होंगी जिससे आप अपनी तुलना कर बेवजह तनाव पाले हुए हैं।

मैं तो यह समझता हूं कि व्यक्ति को महत्वाकांक्षी तो होना चाहिए परंतु हवा को पकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बहुत से लोगों को उनके समय और श्रम के अनुसार बहुत कुछ मिलता है परंतु वे यही सब कुछ जल्दी से पाने के चक्कर में तनाव को आमंत्रित करते हैं। संतोष बड़ी चीज है। जिंदगी को दांव पर लगाकर आसमान के तारों को तोड़ने की कोशिश को एडवेंचर तो कहा जा सकता है, परंतु समझदारी नहीं। मनुष्य को अपने मन को खुशी, आनंद पर केंद्रित करना चाहिए। जीवन में एक मित्र या परिजन ऐसा अवश्य होना चाहिए जिससे सुखदुख की अंतरंग बातें साझा की जा सकें।

जो मित्र की बातों का मखौल उड़ाए और उसके तनाव को कम करने में मददगार होने के बजाय और बढाए, ऐसे मित्र से जितना जल्दी हो, किनारा कर लेना बुद्धिमानी है। मन को खुशी प्रदान करने के लिए छोटी छोटी चीजें काफी होती हैं, जैसे संगीत सुनना, पुस्तकें पढना, गीत संगीत सुनना, कविता-लेख लिखना, मित्रों से गप्पें मारना, घर में कभी कभी अपनी पसंद के पकवान बनाना, छुट्टी व पिकनिक मनाना, पार्टी देना या दोस्तों की पार्टी में शामिल होना, शापिंग करना जैसे काम मन को सुकून दे सकते हैं।

कभी कभी मन करे, किसी की कोई बात बुरी लगे तो गुस्से के रूप में उस पर मन की भड़ास निकाल लेने में भी बुराई नहीं है। इससे मन हल्का हो जाता है। कोई अच्छा काम करता है तो वह भले ही आपका दुश्मन ही हो, उसके काम की दिल से सराहना करनी चाहिए। इससे मन को एक आत्मिक शांति मिलती है, व्यक्ति तनावमुक्त होता है। तनाव मुक्ति के और भी बहुत से उपाय हैं जैसे ध्यान, योगाभ्यास आदि। जब हम तनावमुक्त रहते हैं तो ऐसा समय हमें अपने आपसे जोड़ने में मदद करता है। यह हमने कोरोना काल में लगे लाकडाउन में महसूस किया है।