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हमारे राष्ट्रवाद से ड्रैगन के खजाने पर करोड़ों की चोट
भारत की दिवाली, चीन का 'दिवाला'
 
भारतीयों की दिवाली खरीदारी ने पिछले 10 वर्षों के बिक्री रिकॉर्ड को तोड़ दिया है

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। इस बार दिवाली कई मायनों में अनूठी रही। पिछले साल कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण अनिश्चितता का माहौल था, इस साल टीकाकरण से वायरस संक्रमण के मामले कम होते जा रहे हैं। बाजार में भी रौनक लौटती नजर आ रही है।

लोगों ने उत्साहपूर्वक दीपावली मनाई। साथ ही चीनी उत्पादों के बहिष्कार ने राष्ट्रवाद की भावना को भी मजबूत किया। लोगों ने चीन निर्मित बिजली की झालरों, सजावटी सामान के बजाय मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दी। सोशल मीडिया ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे लोगों ने स्वेच्छा से चीनी उत्पादों से दूरी बना ली।

10 साल का रिकॉर्ड टूटा!
गैर-सरकारी व्यापार संघ कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) की मानें तो भारतीयों की दिवाली खरीदारी ने पिछले 10 वर्षों के बिक्री रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। भारतीयों ने त्योहारी बाजार से 1.25 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का सामान खरीदा है। सोने के आभूषणों की बिक्री 9,000 करोड़ रुपए से अधिक हुई, वहीं पैकेजिंग वस्तुओं पर 15,000 करोड़ रुपए खर्च किए गए।

सीएआईटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया और महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि इस साल दिवाली के दौरान पूरे देश में करीब सवा लाख करोड़ रुपए का कारोबार होने का अनुमान है, जो पिछले एक दशक में रिकॉर्ड आंकड़ा है। अकेले दिल्ली में यह कारोबार करीब 25,000 करोड़ रुपए का था।

मोदी की अपील का असर
लोगों द्वारा त्योहारी खरीदारी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील 'वोकल फॉर लोकल' का असर दिखाई दिया। मिट्टी के दीये, मोमबत्तियां, लैंप, मिठाई, सूखे मेवे, जूते, घड़ियां, खिलौने, घर की सजावट और फैशन का सामान आदि में स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता मिली। इसका फायदा दुकानदारों के साथ ही कुम्हार, शिल्पियों और निर्माण सामग्री से जुड़े कारीगरों, श्रमिकों को मिला है।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बने उत्पादों की बिक्री में भारी वृद्धि चीनियों की जेब पर भी भारी पड़ी है। चूंकि इस त्योहारी सीजन में चीनी व्यवसायों को करीब 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है।

बीजिंग न जाए पैसा
उल्लेखनीय है कि भारत में दिवाली समेत त्योहारी सीजन में चीनी उत्पादों की काफी बिक्री होती रही है। जून 2020 में गलवान घाटी में चीन के विश्वासघात और उससे उपजे हालात ने चीनी माल के प्रति आकर्षण कम कर दिया है। लोगों में यह भावना बलवती हुई है कि चीनी माल से जो पैसा बीजिंग जा रहा है, वह न केवल पाकिस्तान जाकर आतंकवाद को बढ़ावा देगा, बल्कि सीमा पर भारतीय सैनिकों के लिए चुनौती भी पैदा करेगा। ऐसे में बेहतर है कि चीनी माल से परहेज किया जाए।

चीनी माल खराब गुणवत्ता का लेकिन सस्ता होता है। इससे भारतीय उद्योगों को नुकसान हो रहा था। अब राष्ट्रवाद की भावना से स्वदेशी उद्योगों को संजीवनी मिल रही है।

क्या कहते हैं आंकड़े?
एक चर्चित अंग्रेजी दैनिक की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षाबंधन से लेकर नए साल तक भारत 70,000 करोड़ रुपए से अधिक के चीनी उत्पादों का आयात करता है। हालांकि इस साल रक्षाबंधन के दौरान चीनियों को 5,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ। गणेश चतुर्थी के दौरान यह नुकसान 500 करोड़ रुपए से ज्यादा था।

गलवान भिड़ंत के बाद मोदी सरकार ने चीनी ऐप्स और उत्पादों पर शिकंजा कसना शुरू किया था। सरकार ने एक-एक कर चीन के कई ऐप्स पर ताला लगा दिया था। वहीं स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देकर चीनी उत्पादों को बाहर करने की मुहिम ने 2020 के दिवाली सीजन में चीन को 40,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का फटका लगा दिया था।

बनाए रखें यह भावना
चीन को सबक सिखाने के लिए लद्दाख निवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक सहित कई लोगों की मुहिम रंग लाई। 'दक्षिण भारत राष्ट्रमत' भी अपने पाठकों से निरंतर अपील करता रहा है कि स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसका असर आज दिखाई दे रहा है। लगातार खजाने पर चोट से इस पड़ोसी देश के हुक्मरान बौखलाए हुए हैं। उनकी मनोदशा ग्लोबल टाइम्स जैसे मुखपत्र से साफ झलक रही है। ऐसे में जरूरी है कि भारतवासी यही भावना और उत्साह बनाए रखें। इससे स्वदेशी उद्योग विकसित होंगे। इसके साथ ही चीनी उत्पादों का आयात न्यूनतम स्तर पर आने से बिगड़ैल ड्रैगन को भारतीय राष्ट्रवाद की ताकत का अहसास भी होगा।

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