प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

.. राजीव शर्मा ..

दशहरे के सिर्फ तीन दिन बाकी रह गए थे कि मोहल्लेभर में रौनक छा गई। जिसे देखो इसी के लिए फिक्रमंद दिखता था कि रावण का पुतला कितने फीट का होगा और उसकी मूंछें कितनी बड़ी होंगी। शाम को जब चौपाल पर बड़े-बूढ़े हुक्का गुड़गुड़ाया करते तो अक्सर अपने ज़माने की रामलीलाओं का जिक्र करते।

मेरे काका उस मंडली के अगुवा थे जिस पर रावण का पुतला बनाने की महान जिम्मेदारी आ पड़ी थी। कहीं कोई कमी बाकी न रह जाए, इसलिए उन्होंने तमाम काम-धंधे छोड़कर रावण की शरीर रचना का गहन अध्ययन किया ताकि दशहरा आयोजन जन-जन की जुबान पर छा जाए।

अब तैयारियां जोरों पर थीं। पुराने अखबार, चप्पलें और कटाई के बाद बचा सूखा घास रावण बनाने के काम आया। फिर पटाखों की बारी आई। रावण के पेट में ढेर सारी फुलझड़ियां और रॉकेट लगाए गए।

कार्य संपन्न होने के बाद रावण को लाकर चौपाल पर खड़ा कर दिया गया। काका की हार्दिक इच्छा थी कि राहगीर इस रावण के निर्माता की शान में दो शब्द जरूर बोलें। कुछ लोगों ने बोले भी लेकिन ज्यादातर ने रावण का मखौल ही उड़ाया।

दरअसल रावण का पेट और सिर जरूरत से ज्यादा मोटे हो गए। वहीं पैरों की मजबूती की ओर काका ने ध्यान ही नहीं दिया, इसलिए वे कमजोर और पतले रह गए। पहली ही नजर में यह रावण डरावना कम, हास्यास्पद ज्यादा लगता था। खैर, हमें इन सब बातों की ज्यादा परवाह नहीं थी। अब सबको रात का बेसब्री से इंतजार था।

शाम ढलने के बाद अंधेरा छाने लगा। तभी अप्रत्याशित रूप से एक समस्या उत्पन्न हो गई। दिक्कत यह थी कि रावण का दहन कौन करे। यहां राम बनने के लिए हर कोई तैयार था और रावण बेचारा एक, लिहाजा समस्या गंभीर थी।

अंधेरा गहरा होने लगा, मुहूर्त्त सामने था। राम बनने की माथापच्ची में ही आधा घंटे से ज्यादा वक्त बीत गया। आखिरकार तय हुआ कि इसके लिए टॉस किया जाए लेकिन किसी के पास सिक्का नहीं था। दो-तीन लोगों के पास नोट जरूर थे। उनसे टॉस नहीं हो सकता था।

आखिरकार दो लोगों के नाम पर सहमति बनी और कहीं से सिक्का लाकर उछाला गया। यहां भी काका की किस्मत ने जोर मारा और वे विजयी घोषित हुए। उत्साहित भीड़ ने नारे, सीटी और शोर से माहौल जोशीला बना दिया।

तुरंत धनुष-बाण और केरोसीन का इंतजाम किया गया। तीर पर आग लगाकर काका रावण दहन के लिए रवाना हुए, लेकिन यह क्या! रावण तो जल रहा था। उसके पेट में लगाई फुलझड़ियां रंगीन रोशनी कर रही थीं, धमाकों के साथ पटाखे फूट रहे थे।

काका के पहुंचने से पहले ही किसी ने रावण को आग के हवाले कर दिया। उनका धनुष किसी काम न आया। मालूम हुआ कि जब हम टॉस करने में व्यस्त थे, तभी किसी ने मौके का फायदा उठाकर रावण दहन कर दिया।

वाह री किस्मत, जिस रावण की रचना में पूरा हफ्ता घोल दिया, उसका नतीजा यह निकला कि दहन कोई और कर गया। मन के अरमान मन में ही रह गए। कोई और उपाय न देख गुस्साए काका धनुष फेंक कर चले गए और संकल्प लिया कि उस शैतान को पकड़कर ही दम लेंगे जिसने इस बदमाशी को अंजाम दिया है।

अगले दिन पूछताछ हुई, देवता का वास्ता दिया गया, कसमें दिलाईं, लेकिन अपराधी पकड़ में न आया। इस घटना के बाद कई दशहरे आए और चले गए, फिर भी उस खुराफाती का भंडाफोड़ नहीं हुआ। काका को आज भी उसका इंतजार है। यदि आपको कोई खोज-खबर मिले तो जरूर बताइए।