दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर
दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर

.. श्रीकांत पाराशर ..

बॉलीवुड में मादक पदार्थों के सेवन और खरीद फरोख्त के आरोपों से न केवल बॉलीवुड में हड़कंप मचा हुआ है बल्कि इसके साथ ही बेंगलूरु में भी मादक पदार्थों यानी ड्रग्स के काले कारोबार से जुड़े लोगों की धरपकड़ के बाद सामान्य से व्यक्ति भी अपने बच्चों को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं। यह चिंता जायज भी है क्योंकि किसी भी बड़ी बीमारी का इलाज करने से भी ज्यादा समझदारी उससे पूर्व सावधानी बरतने में है। और ड्रग्स की लत एक बार लग जाए तो वह व्यक्ति में बाकी के और खतरनाक अवगुण खुद ले आती है।

ड्रग्स के बारे में थोड़े थोड़े अंतराल के बाद एक बार अखबारों की सुर्खियों में कुछ दिन के लिए मुद्दा छा जाता है और धीरे धीरे उसकी चर्चा बंद हो जाती है परंतु इस बार फिल्म स्टार सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत और फिर उसकी मौत के रहस्य को सुलझाते सुलझाते ड्रग्स एंगल को भी खंगालने में जुटी जांच एजेंसियों के सामने जिस तरह के खुलासे हो रहे हैं उससे वे तो स्तब्ध हैं ही, आम व्यक्ति भी असमंजस की स्थिति में है क्योंकि किशोर और युवा वय के लड़के-लड़कियां इन फिल्मी स्टार्स में अपना रोल मॉडल ढूंढते हैं, उनके जैसी शोहरत, उनके जैसी सुख-सुविधाएं, उनके जैसा रहन-सहन और उनके जैसी जिंदगी जीने के सपने पाल लेते हैं।

हालांकि सबके सब बच्चे ऐसे नहीं होते परंतु बहुत सारे बच्चे इन स्टार्स को बहुत गहराई से फोलो करते हैं। वे भावनात्मक रूप से भी उनसे जुड़ जाते हैं। वे केवल उनकी फिल्में ही नहीं देखते, गूगल और इंस्टाग्राम पर उनकी सब गतिविधियां बारीकी से देखते हैं, उनकी गोसिप्स पढते हैं, उनके जैसे कपड़े पहनना चाहते हैं, उनके जैसी पार्टियां करना चाहते हैं।

दो दशक पहले तक यह बुखार केवल कॉलेज स्तर के विद्यार्थियों में ही दिखाई देता था परंतु अब यह स्कूलों तक पहुंच गया है। सबको पता है कि जो बड़ी बड़ी स्कूल कॉलेज हैं उनमें डेढ दो दशक पहले भारी डोनेशन लिया जाता था। अब उस डोनेशन ने फीस का रूप ले लिया है क्योंकि डोनेशन पर हजार तरह की पाबंदियां थीं इसलिए सीधे-सीधे फीस ही इतनी ली जाने लगी कि वह डोनेशन को भी शर्मिंदा कर देती है।

अब ऐसी स्कूलों में कोई सामान्य व्यक्तियों के बच्चे तो पढ़ नहीं सकते। बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी जिनकी तनख्वाह लाखों में होती है और ऊपर की कमाई होती है, बड़े उद्योगपति, बड़े बड़े राजनेता, बड़े शहरों के बड़े व्यवसायी, बाहरी प्रदेशों के बड़े जमींदारों और जिन्होंने कम समय में हाल के बरसों में किसी न किसी तरह से चमत्कारिक सफलता पाई है, खूब धन कमाया है, उनके बच्चे इन धनाढ्य लोगों पर आश्रित स्कूलों में प्रवेश पाते हैं। सब स्कूल ऐसे नहीं हैं परंतु कई स्कूल कॉलेजों के तो नाम भी समय समय पर सोसाइटी में चर्चा में होते हैं फिर भी अभिभावक इन स्कूलों के प्रति अपना मोह नहीं त्याग पाते हैं।

कुछ लोग उतने धनाढ्य तो नहीं होते कि भारी फीस वाली स्कूल-कॉलेज में अपनी संतान को पढ़ाएं परंतु सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए, या फिर देखादेखी, या अपने बेटे या बेटी की जिद्द के सामने हार मानकर या उस शिक्षा संस्थान का नाम नामी-गिरामी संस्थानों की सूची में देखकर अपनी हैसियत से ज्यादा वाली फीस भरने को तैयार इसलिए हो जाते हैं कि उनको लगता है कि हम तो बच्चे का उतना खयाल रख नहीं पाते जितना पैसे वाले लोग रखते हैं, तो कम से कम नामी संस्थान में पढ़-लिखकर किसी योग्य हो जाएगा तो उसका जीवन सफल हो जाएगा। इसलिए अभिभावक अपनी जरूरतों को भी लगाम लगाकर और पैसा कमाने के लिए ज्यादा भाग-दौड़कर भी अपनी संतान को कथित नामी शिक्षा संस्थान में दाखिला दिलाते हैं।

ऐसा नहीं कि इन संस्थानों में अच्छे बच्चे नहीं होते, जरूर होते हैं जो केवल अपना पढाई का ध्येय लेकर आगे बढते हैं और ऐसे बिगड़ैल बच्चे भी होते हैं जिनके लिए पढाई उतनी अहम नहीं होती। वे मौज-मस्ती के लिए स्कूल-कॉलेज में दाखिला लेते हैं। ऐसे लड़के लड़कियां अपने जैसे साथी तलाश लेते हैं और इनकी लाइफ स्टाइल से प्रभावित होकर धीरे धीरे इनकी तरफ दूसरे बच्चे भी आकृष्ट हो जाते हैं। पैसा खर्च करना इनके लिए कोई परेशानी का कारण नहीं, इसलिए छोटी-छोटी पार्टियां अरेंज करना, रेस्तरां में महंगा भोजन, पब और हुक्का बार में तफरी करना इनका रोज का काम हो जाता है।

ऐसे विद्यार्थी दूसरों पर धाक जमाने के लिए मित्रों पर अपनी पाकेट से खर्च करते हैं और अपने दोस्तों की संख्या बढा लेते हैं। ये सब ग्रुप्स में कुछ समय बाद शहर के आसपास ढाबों, रिसोर्ट्स में आउटिंग करते हैं। फिर यह दायरा शहर से बाहर तक बढ जाता है। कुछ मामलों में पिता तक बात पहुंचती ही नहीं, मम्मी से स्वीकृति ही काफी होती है तो कभी कभी पिता भी पत्नी की तरफ से बच्चे के लिए की गई तरफदारी के दबाव में ऐसे “इवेंट्स” की अनुमति दे देता है। बस लड़का हो या लड़की, राह भटकने में कितनी देर लगती है। एक बार गाड़ी पटरी से उतरी तो बस उतरी।

मोबाइल फोन की सुविधा, बच्चों पर नाजुक उम्र में आवश्यक नजर न रखना, विश्वास के नाम पर स्वच्छंदता की छूट देना, अपनी संतान को आवश्यक समय देने की खानापूर्ति पैसे से करना, बच्चों से पिता के आत्मीय लगाव और संवाद का अभाव, अति लाड़ प्यार के कारण बच्चों की हर जिद्द पूरी करना तथा अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति से उसे अवगत कराते हुए समय समय पर जरूरी समझाइश न देना, तथा कुछ लोगों का यह मानकर चलना कि उनका बेटा या बेटी तो ऐसा हो ही नहीं सकता कहकर निष्फिक्र रहना, आदि वे कारण हैं जिनके चलते बच्चे बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं।

बुरी आदतें कभी जन्मजात नहीं होतीं बल्कि बुरी संगत के संक्रमण से लगती हैं। यदि समय रहते अपनी संतान को सावधान करें, संवाद कायम रखें, उसे भले बुरे का भान कराते रहें तो बच्चे कभी निराश नहीं करेंगे। बात बिगड़ने के बाद स्कूल को, पत्नी को या किसी और को दोषी बताने से अच्छा है कि बुराई को पास ही न फटकने की बच्चों को हिदायत दी जाए। ड्रग्स से तो जीवन बर्बाद होना तय है क्योंकि यह बहुत महंगा शौक है जो भयानक रूप लेने पर चोरी, डकैती, हत्या सब कुछ सिखा देता है। अपनी असीमित महत्वाकांक्षाओं को सीमित कर यह सोचना चाहिए कि थोड़ी सी सुख सुविधाएं कम जुटा लेंगे परंतु बच्चों के साथ उसके अच्छे भविष्य के साथ अपना भी शांत जीवन बिताएंगे तभी फायदे में रहेंगे।