अपने शौक को बनाइए पहचान

अपनी टीम के साथ कोंग कारा (बीच में), चित्र: मेघालय बेसिन विकास प्राधिकरण, मेघालय सरकार।
अपनी टीम के साथ कोंग कारा (बीच में), चित्र: मेघालय बेसिन विकास प्राधिकरण, मेघालय सरकार।

.. राजीव शर्मा ..

शिलांग/दक्षिण भारत। आपने कैरी, नींबू, गाजर, मिर्च का अचार तो खाया होगा, क्या बांस का अचार खाना चाहेंगे? उत्तर-पूर्व में बांस खूब उगाया जाता है जिसका इस्तेमाल अचार बनाने में भी होता है। इस अचार को मेघालय के शिलांग स्थित पोहक्सेह निवासी फिकारालिन वानशोंग ने नई पहचान दी है। वे अचार के साथ बेकरी उद्योग भी चलाती हैं और स्थानीय लोगों में कोंग कारा के नाम से मशहूर हैं।

कोंग कारा को खाना बनाना बहुत पसंद है। वे बचपन में जब अपनी मां को खाना बनाते देखतीं तो खुद भी ऐसा करना चाहतीं। उस समय कोंग कारा या परिवार में किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन यही शौक उनकी पहचान बनेगा।

कैसे हुई शुरुआत?
कोंग कारा के पिताजी अपने घर के पास स्थित बगीचे में फल और सब्जियां उगाते थे। जब ये पक कर तैयार हो जातीं तो कोंग कारा की मां परंपरागत विधियों से अचार बनातीं जो बहुत स्वादिष्ट होता। आसपास के लोगों के यहां कोई मेहमान आता तो वे उनसे अचार लेने जरूर आते।

मां को अचार बनाते देख कोंग कारा भी उनका हाथ बंटातीं। धीरे-धीरे उन्होंने अचार बनाने की तमाम बारीकियां सीख लीं, जैसे कितना मसाला डालना है, कितना तेल और कितने दिनों में अचार तैयार होगा।

वह महत्वपूर्ण घटना
इसी दौरान, उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना हुई। उन्होंने 1998 में फूड प्रोसेसिंग पर आधारित दो हफ्तों की ट्रेनिंग ली जो सरकार द्वारा स्थानीय युवाओं को मुहैया कराई गई थी। कोंग कारा ने ट्रेनिंग से जो ज्ञान अर्जित किया, उस पर विभिन्न प्रयोग करती रहीं। वे इस अवधि में अचार, जैम, स्क्वेश आदि बनाने में निपुण हो गईं।

करीब सात साल बाद कोंग कारा ने राजधानी शिलांग में लगे एक मेले में स्टॉल लगाया और यहीं से उनके ज़िंदगी में नया मोड़ आया। वे मेले में बांस, मिर्च, कटहल, शलगम, मशरूम, नींबू समेत जितने भी अचार लेकर गई थीं, उन्हें लोगों ने बहुत पसंद किया और अच्छी कमाई हुई। कई लोगों ने यह भी कहा कि हमें और ज्यादा मात्रा में अचार चाहिए।

इससे कोंग कारा का हौसला बढ़ा और उन्होंने बड़े स्तर पर अचार बनाना शुरू कर दिया। इस तरह ‘कारा फ्रेश फूड्स’ की शुरुआत हुई। वे अचार बनाने से लेकर उसे स्टोर तक पहुंचाने का काम स्वयं करतीं।

विदेशों तक पहुंचा मेघालय का अचार
जब मांग बढ़ने लगी तो रसोई घर से ही पूर्ति कर पाना संभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की और एक दर्जन से ज्यादा उत्पाद तैयार करने लगीं। कोंग कारा बताती हैं कि उनकी कंपनी का अचार भारत के अनेक गांव, शहरों तक तो जाता ही है, अब इसका स्वाद अमेरिका तक पहुंच गया है। इसके अलावा कई देशों में अचार के प्रशंसक हैं।

कोंग कारा ने बताया कि वे उत्पाद की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा वरीयता देती हैं। इसलिए जो भी सामग्री खरीदती हैं, उनकी शुद्धता का ध्यान रखती हैं। वहीं, स्थानीय किसानों से मसाले, फल, सब्जी आदि खरीदने से उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

कोई काम छोटा नहीं
कोंग कारा अचार के अलावा केक, ब्रेड, पेस्ट्रीज, बिस्किट जैसे बेकरी उत्पाद भी तैयार करती हैं। हालांकि, यह अभी उतना आगे नहीं बढ़ा जितना कि अचार का कारोबार। कोंग कारा हर दिन नया सीखते रहने को बहुत जरूरी मानती हैं। उनका कहना है कि सीखते रहना वह आदत है जो आपके शौक को जुनून और कामयाबी में बदल सकता है। कोई काम छोटा नहीं होता, बस मेहनत और खुद पर भरोसे के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

नए साल में नई उम्मीदें
कोंग कारा को विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। वे स्थानीय महिलाओं को फूड प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण भी देती हैं। उन्हें 2010 में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने ‘सर्वश्रेष्ठ उद्यमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया था।

पिछले साल कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन में अचार का कारोबार प्रभावित हुआ लेकिन अब हालात काफी ठीक हो चुके हैं। कोंग कारा को उम्मीद है कि यह साल बहुत बेहतर होगा और मेघालय के खानपान को वैश्विक पहचान मिलेगी।