अपनी बेटी के साथ मालसॉमी
अपनी बेटी के साथ मालसॉमी

मिजोरम की मालसॉमी ने ‘पुआन’ निर्माण कला को विदेशों तक पहुंचाया

.. राजीव शर्मा ..

आइजोल/दक्षिण भारत। भारत विविधता और कला से समृद्ध देश है। बदलते जमाने के साथ हम बहुत कुछ भूल गए लेकिन अब भी कई लोग इन्हें जीवित रखने और प्रसार करने के लिए कोशिशों में जुटे हैं। मिजोरम की मालसॉमी परंपरागत ढंग से कपड़ा बुनाई की कला सीखने के बाद अब इसे एक कारोबार का रूप देते हुए अनेक लोगों को रोजगार भी दे रही हैं।

वे मुख्यत: ‘पुआन’ निर्माण के लिए जानी जाती हैं। पुआन एक कपड़ा होता है जिसका इस्तेमाल साड़ी की तरह लपेटने और पीठ या गोद में बच्चे को संभाले रखने के लिए किया जाता है। पुआन शादियों और शुभ अवसरों पर उपहार के तौर पर भी दिया जाता है। इसे पहनना भी अपने आप में एक कला है। वहीं, महिलाएं घरों या खेतों में काम करते समय इसके जरिए अपने बच्चों को करीब रख सकती हैं।

मालसॉमी ने बचपन से अपनी मां, मौसी और स्थानीय महिलाओं को पुआन बुनाई करते देखा है। पुआन के विभिन्न डिजाइन उन्हें आकर्षित करते रहे हैं। चूंकि उनके पिता प्रशासनिक सेवा में थे, इसलिए उन्हें देश के कई गांव-शहर देखने और स्थानीय संस्कृति से रूबरू होने का मौका मिला।

बचपन में जब वे अपनी मां को पुआन बनाते देखतीं तो खुद भी हाथ बंटाने की कोशिश करतीं, जैसा कि बच्चों का स्वभाव होता है। धीरे-धीरे उन्हें समझ में आया कि पुआन सिर्फ एक कपड़े का नाम नहीं है। यह एक विरासत, संस्कृति, कला के साथ ही बहुत लोगों के लिए आजीविका का साधन है।

संस्कृति की अभिव्यक्ति
मालसॉमी ने पुआन बुनाई की विभिन्न तकनीकों का अध्ययन किया और इस कला का देश-दुनिया में प्रसार करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। इसी सिलसिले में उन्होंने साल 2017 में ‘ज़ो वीव’ की स्थापना की। यह नाम कपड़ा बुनाई और मिजोरम की संस्कृति दोनों को अभिव्यक्त करता है।

मालसॉमी ने पुआन निर्माण की इस यात्रा में बहुत लोगों को जोड़ा। आज उनके पास पांच दर्जन से ज्यादा लोगों का नेटवर्क है जो पुआन निर्माण में विशेषज्ञता रखते हैं। मालसॉमी ने जब सोशल मीडिया पर पुआन की तस्वीरें पोस्ट कीं तो देशभर में लोगों का ध्यान इस कला की ओर गया। यही वजह है कि उन्हें मिजोरम के अलावा कई राज्यों से ऑर्डर मिलने लगे।

इंटरनेट बना ताकत
कला, परिश्रम और इंटरनेट का यह संयोग इतना सफल हुआ है कि मालसॉमी अब तक 2,000 से ज्यादा पुआन बेच चुकी हैं। यही नहीं, अब वे हस्तनिर्मित शॉल तैयार कर बिक्री के लिए प्रस्तुत कर रही हैं जिन्हें काफी पसंद किया जा रहा है।

मालसॉमी बताती हैं कि वे अपने उत्पादों में दो चीजों का खास ध्यान रखती हैं- परंपरा और आधुनिकता। पुआन एक प्राचीन वस्त्र परंपरा है लेकिन मुझे इसके साथ नए प्रयोग करना पसंद है। मैं गुणवत्ता बरकरार रखने पर खास जोर देती हूं। ​फिर कड़ी मेहनत के बाद जो कपड़ा तैयार होता है, वह लोगों को जरूर पसंद आता है।

अमेरिका तक पुआन की धूम
मालसॉमी ने बताया कि उनके द्वारा बनाए गए पुआन न केवल मिजोरम और अन्य राज्यों में मंगाए जाते हैं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई देशों से लोग ऑर्डर भेजते हैं और अपने प्रियजन को मिजोरम की संस्कृति से परिपूर्ण पुआन भेंट करते हैं।

पुआन पहने युवतियां
पुआन पहने युवतियां

मालसॉमी का बचपन आइजोल में बीता। उन्होंने दिल्ली से अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई की। वे शादी के बाद अपने पति के साथ सिंगापुर चली गईं। हालांकि अब तक उनके मन में पुआन का कारोबार करने का कोई विचार नहीं था।

ऐसे हुई शुरुआत
जब उनके पति का तबादला भारत हो गया तो वे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और परिचितों के यहां विभिन्न मांगलिक अवसरों पर जाते। यहां लोगों को पुआन भेंट करते देखा। साल 2016 में बच्चे के जन्म के बाद मालसॉमी ने पुआन खरीदना चाहा। वे इच्छित डिजाइन के पुआन खरीदने बाजार गईं। हालांकि वे जैसा पुआन चाहती थीं, वह नहीं मिला।

यहीं से उनके मन में विचार आया कि मैं खुद ही पुआन बनाकर बेचना क्यों न शुरू कर दूं! अब मालसॉमी ने दोबारा पुआन निर्माण की बारीकियां सीखीं और इस कला के जानकारों को जोड़ा। वे कलाकारों को निर्देश देकर आकर्षक डिजाइन के पुआन तैयार करातीं और बिक्री के लिए उपलब्ध करातीं।

मालसॉमी के इस प्रयास को बहुत सराहना मिली और सभी पुआन बिक गए। इससे एक सिलसिला शुरू हुआ जो अब कई कलाकारों के लिए रोजगार का जरिया बन चुका है। मालसॉमी बताती हैं कि एक खूबसूरत पुआन के पीछे सिर्फ कुछ धागों का जमघट ही नहीं है, यह एक कलाकार की साधना और परिश्रम है। इसके लिए बहुत गंभीरता से मेहनत करनी होती है। मालसॉमी कहती हैं कि हमें चुनौतियों और गलतियों से सीखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए।