प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

.. श्रीकांत पाराशर ..

नकारात्मक मन। यानी, नेगेटिव माइन्ड। हम नकारात्मक मन लिए घूमते रहते हैं। यह नहीं समझ पाते कि यह नेगेटिव माइन्ड हमें बहुत सी परेशानियों में डालने वाला है। जो हमारा हितैषी होता है, उसे हम दुश्मन समझे बैठे होते हैं क्योंकि हमारा माइंड नेगेटिव सोचता है, उसे हितैषी नहीं मानता। हमें मित्र तब दिखाई पड़ता है जब वह हमसे दूर जा चुका होता है। हमें सुख का पता तभी लगता है जब वह हाथ से निकल चुका होता है। हमें समय का महत्त्व तब पता लगता है, जब हमारे पास समय बचता नहीं।

हमें प्रेम का भी तब पता चलता है जब प्रेम खत्म होने लगता है। प्रेम कड़वाहट में बदल जाता है तब महसूस होता है कि प्रेम के मायने क्या होते हैं। जब कोई मर जाता है तब पता चलता है कि उसकी अहमियत क्या थी। जब तक जिंदा है तब तक हम उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं। पिता जिंदा है तो बेटे को भान भी नहीं रहता कि पिता का महत्त्व क्या है। जब बाप मर जाता है तो छाती पीट पीट कर रोता है। जब मां-बाप जिन्दा रहते हैं तब तक लोगों को मालूम नहीं होता कि उनके होने का मतलब क्या है।

हमारा नेगेटिव माइन्ड है। नहीं होने पर हमें अहमियत का अहसास होता है। बाप मर गया तो उसके शव पर सिर पटक पटक कर रोते लोगों को देखा है परन्तु जब वह जिंदा है तब उसका आदर-सम्मान करना भी नहीं आता। पानी का असली टेस्ट तभी पता चलता है जब जोरों की प्यास लगी होती है। सुनसान रेगिस्तान में जा रहे हैं। आसमान में सूरज तप रहा है। मंजिल कोसों दूर है। प्यास लगी है तो मालूम पड़ता है कि पानी की दो बूंदें भी जीवन के लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। पानी सहजता से मिलता है तो हमें उसका मूल्य पता नहीं होता। बिखेरते रहते हैं, बिखरने देते हैं परन्तु जब एक घूंट पानी की जरूरत हो तब एक बूंद पानी की अहमियत का भी आभास होता है। यही बात प्यार पर, स्नेह पर लागू होती है।

माता-पिता, रिश्तेदार, मित्र, अपनों के प्यार का भी तब पता चलता है जब हम अकेले होते हैं। जब चारों तरफ से प्यार बरसता दिखाई देता है तब अच्छे लोगों के प्यार की अनुभूति नहीं हो पाती क्योंकि हमारा मन नकारात्मक है। जो कुछ हमारे पास नहीं होता वह हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। जो उपलब्ध है वह बेकार है, गैर महत्वपूर्ण है। जो कुछ हमारे पास है उसको हम भूल जाते हैं और जो नहीं है उसको पाने में जुट जाते हैं। मनुष्य सहज ही स्वार्थी बन जाता है। कई बार आदमी इतना स्वार्थी हो जाता है कि वह सब कुछ पाना चाहता है परन्तु “सब कुछ’ पाने के प्रयास में “बहुत कुछ’ खो भी देता है जो कि सब कुछ पाने से कम मूल्यवान नहीं होता।

पोजिटिव माइन्ड बहुत कम लोगों के पास होता है। ज्यादातर लोग नेगेटिव माइन्ड लिए ही घूमते रहते हैं। इस चक्कर में होता यह है कि जो कुछ है वह दिखाई नहीं देता। जब कुछ नहीं रहता है उस समय दिखाई देता है कि वह सब कुछ हमारे पास था, जो अब नहीं है। जब हमारे पास हमारे अपने होते हैं, हम उनके होने का एहसास नहीं कर पाते। उनसे छल कपट करते हैं। उनको धोखा देते हैं। उनका मान-सम्मान नहीं करते। उनसे अच्छा व्यवहार नहीं करते। दुनिया के सामने प्रदर्शन तो करते हैं कि हम अच्छे हैं, परन्तु असल में हम छल-कपट से भरे होते हैं। घर में माता-पिता, बड़े-बुजुर्ग का आदर तभी करते हैं जब दुनिया देख रही होती है। देखने वालों की नजर घूमी नहीं कि अपना भी नजरिया बदलते देर नहीं लगती। मां-बाप के मरने पर फूट फूटकर रोने वालों की असलियत उनके पड़ौसियों से पूछें तो पता चलेगी कि बेचारे माता-पिता जब जिंदा थे तो उन्हें ठीक से रोटी भी नहीं दी जाती थी और मरने पर हाय तौबा मची है।

ऐसा नहीं है कि अपनों के मरने पर किसी को दुख नहीं होता परन्तु सचाई यह है कि असली महत्व उनका तभी पता चल पाता है जब उनका अभाव खलता है। व्यक्ति जब खुद तन्हाई में होता है, अकेलापन महसूस करता है तब “अपनों’ को याद करता है, उनके स्नेह-प्यार को याद करता है परन्तु वही “अपने’ जब स्नेह लुटा रहे होते हैं तब उनके स्नेह-प्यार का कोई मोल नहीं होता। बल्कि बहुत से लोग तो अपनों को कदम कदम पर दुखी करते हैं। उनके दिल को चोट पहुंचाते हैं। उनके अरमानों को आघात पहुंचाते हैं। उन्हें जलील करते हैं। अपने ही खासमखास को, अपने ही माता-पिता को, जिन्होंने अंगुली पकड़कर सड़क पार करना सिखाया उनको, अपमानित करते हैं। जो मां-बाप जिंदगी बनाते हैं उन्हीं को जिंदगी में अपनी खुद की नाकामियों के लिए उनके बच्चे कोसते नजर आते हैं। अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो दोष उन पर मढ़ते हैं जिन्होंने जीवन का निर्माण किया, किसी काबिल बनाया।

एक पेड़ से एक लाख माचिस की तीलियां बन सकती हैं, यह निर्माण का सूचक है परन्तु एक तीली एक लाख पेड़ों को जलाकर राख कर सकती है। एक नकारात्मक विचार कितने ही सकारात्मक विचारों को नष्ट कर सकता है। फिर हम तो पूरा नेगेटिव माइंड ही लिए चलते हैं। स्पष्ट है कि नकारात्मक सोच के साथ सृजन संभव नहीं है। जो नेगेटिव माइंड लेकर चलता है वह सब कुछ नेगेटिव ही सोचता है। इसी सोच के चलते उसकी नजर अपने-पराए का भेद नहीं कर पाती। अच्छाई-बुराई में अंतर उसे समझ में नहीं आता। सोच नेगेटिव होने से केवल अपना स्वार्थ तो नजर आता है परन्तु अपनों का अपनत्व सामने होते हुए भी दिखता नहीं। रिश्ते-नातों की अहमियत उसके लिए गौण हो जाती है।

किसी ने उसके लिए कुछ भी अच्छा किया तो उसे पल भर में भुला दिया जाता है। उसका पूरा माइंड ही नेगेटिव है तो सकारात्मक दृष्टिकोण आएगा कहां से? ऐसा माइंड अपनों से दूरी पैदा करता है, अपनों के प्रति घृणा पैदा करता है, मन में अपनों का आदर घटाता है, अपनों के प्रति अपमानजनक भाव पैदा करता है, अपनों को धोखा देने का कुविचार मन में जगाता है और व्यक्ति इससे अनभिज्ञ रहता है। समय का चक्र चलता रहता है, दुनिया आगे बढ़ती रहती है, घड़ी की सूइयां हमेशा की तरह उसी गति से चलती रहती हैं और हम अपने व्यवहार से अपनों को ही कष्ट पहुंचाते रहते हैं, दुखी करते रहते हैं, सबक सिखाते रहते हैं, दुनियादारी का पाठ पढ़ाते रहते हैं और अपने अहम का पोषण करते रहते हैं। हमें लगता है कि हम आज ऐसा करके बहुत कुछ पा रहे हैं परन्तु असल में बहुत कुछ खो रहे होते हैं, जिसका अहसास उस समय होता है जब हम उसे खो चुके होते हैं, जो हमारे पास होना चाहिए।

ग्वालियर के एक शायर अमित चितवन की एक गजल के शेर देखिए-

बेशक तेरा अपना साया है लेकिन,
जो अपना है, वो ही धोखा करता है।
उसने हमको सिखलाई दुनियादारी,
वो धोखा देता है, अच्छा करता है।