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‘पर्सनल लॉ समाप्त हो, महिला अधिकारों पर आदर्श कानून बनाया जाए'
लड़कियों के विवाह की आयु बढ़ाए जाने के क्या सामाजिक एवं आर्थिक परिणाम होंगे?
 
सरकार का तर्क है कि कुपोषण, महिला स्वास्थ्य एवं सशक्तीकरण की दिशा में यह बड़ा कदम है

नई दिल्ली/भाषा। केंद्र सरकार ने लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का फैसला किया है। अभी यह उम्र 18 साल है जिसे बढ़ाकर 21 साल किए जाने का प्रस्ताव है। अधिकतर लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन मुद्दे पर कुछ विवादित बयान भी सामने आए हैं। इस विषय पर सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डॉ. रंजना कुमारी से पांच सवाल एवं उनके जवाब:

सवाल : सरकार लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करने जा रही है, इस फैसले को आप कैसे देखती हैं?

जवाब : लड़के और लड़कियों के विवाह की आयु एक हो तथा पूरे देश एवं समाज में इसकी स्वीकृति बने, इसका हम शुरू से ही समर्थन करते रहे हैं। सरकार के इस कदम का हम स्वागत करते हैं। लड़के और लड़कियों के विवाह की आयु अब तक अलग-अलग है जो संवैधानिक बराबरी एवं समानता के अधिकार के खिलाफ है। अलग-अलग आयु का कोई तर्क नहीं है।

सवाल : लड़कियों के विवाह की आयु बढ़ाए जाने के क्या सामाजिक एवं आर्थिक परिणाम होंगे?

जवाब : लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाए जाने से उन्हें शिक्षित होने, कॉलेजों में प्रवेश करने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अधिक समय मिलेगा। इससे लड़कियों के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की दर भी कम होगी क्योंकि अभी कम उम्र में शादी की वजह से लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है। इससे लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद मिलेगी और उनके लिए अवसर बढ़ेंगे। इस कदम से बाल विवाह की प्रथा को भी जड़ से समाप्त करने में मदद मिलेगी। लेकिन यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह इसे एक सामाजिक मानदंड के रूप में स्वीकार्य बनाए।

​सवाल : विभिन्न धर्मों में ‘पर्सनल लॉ’ के अनुरूप विवाह संबंधी प्रावधान होने के मद्देनजर इस प्रस्तावित कानून को लेकर एक वर्ग द्वारा आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

जवाब : मेरा मानना है कि सभी पर्सनल कानून महिला विरोधी हैं चाहे हिंदू पर्सनल लॉ हो या मुस्लिम पर्सनल लॉ हो या चाहे क्रिश्चियन पर्सनल लॉ हो। इनमें विवाह, तलाक, भरण पोषण संबंधी एवं अन्य प्रावधान महिलाओं के खिलाफ हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए एक आदर्श कानून होना चाहिए जो पूरे देश में लागू हो सके और जो आगे बढ़ने की सोच पर आधारित हो। सभी पर्सनल लॉ को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 

इस कदम से महिलाओं को अपने जीवन में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा और उनके अधिकारों एवं अस्मिता का हनन रोकने में मदद मिलेगी। उत्तराधिकार से जुड़े कानूनों में लड़कियों को लेकर सरकार ने पिछले समय में कुछ कदम उठाए लेकिन समाज में इन बदलावों को स्वीकृति नहीं मिली है और अभी भी अर्जित संपत्ति में महिलाओं को अधिकार नहीं मिला है। यह पर्सनल लॉ के कारण ही है। ऐसे में महिला अधिकारों के विषय से धर्म को अलग कर दिया जाना चाहिए।

सवाल : एक वर्ग इसे जनसंख्या नियंत्रण पर विधान लाने का प्रथम चरण बताकर तथा कई अन्य कारणों के आधार पर इसकी आलोचना कर रहा है, इस पर आप क्या कहेंगी?

जवाब : जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं वे पुरातनपंथी विचारधारा के लोग हैं और वे नहीं चाहते कि समाज में महिलाओं को समानता का अधिकार मिले तथा वे अपने पैरों पर खड़ी हों। भारत में जिस समय महिलाओं को उनके भविष्य और शिक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए, उस समय उन्हें विवाह के बोझ से दबा दिया जाता है। आज 21वीं सदी में रूढ़िवादी सोच में बदलाव की आवश्यकता है, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा।

सवाल : सरकार का तर्क है कि कुपोषण, महिला स्वास्थ्य एवं सशक्तीकरण की दिशा में यह बड़ा कदम है, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

जवाब : कम उम्र में लड़कियों की शादी होने से बच्चे भी जल्दी पैदा हो जाते हैं और मां एवं शिशु दोनों की सेहत को लेकर चिंता की बात रहती है। कई बार देखा गया है कि लड़की 18 साल की नहीं होती है और तब भी उसका विवाह कर दिया जाता है। इस जमाने में भी लोग लड़कियों को बोझ समझते हैं। इस सोच को बदलना जरूरी है और लोगों को समझना होगा कि लड़कियों की शिक्षा जरूरी है। लड़कियां सिर्फ शादी करने और बच्चा पैदा करने के लिए दुनिया में नहीं आती हैं। लड़कियों को सही तरीके से शिक्षा देनी होगी। उन्हें सही जीवनसाथी के चुनाव का हक देना होगा और तभी चीजें बदल पाएंगी।

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