प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

.. राजीव शर्मा ..

जयपुर/दक्षिण भारत। इस वक्त जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं तो आसमान में काले बादल उमड़-घुमड़कर छाए हुए हैं। हवाओं में बरसात की एक खास किस्म की खुशबू घुली हुई है जो इस बात का संकेत है कि कुछ ही देर में बादल झूमकर बरसेंगे। आज मैंने कहीं दूर .. एक पेड़ पर बैठे मोर की आवाज भी सुनी! मुझे याद नहीं आता कि पिछली बार कब यह सुनी थी.. शायद कई साल पहले गांव में!

रोजमर्रा की भागदौड़ और शहरों के फैलाव के बीच हमें इस बात का अहसास बहुत देर से होता है कि किन्हें बहुत पीछे छोड़ आए हैं। इसी तरह मैंने कई शब्द वर्षों से नहीं सुने हैं और पूरा यकीन है कि जयपुर शहर में जन्मी और पली-बढ़ी मौजूदा युवा पीढ़ी में से शायद ही कोई इनका उपयोग करता हो।

जरा गौर कीजिए- मिरियो, दिसावर, घड़ूचियो, खेळ, मूण, अगूणो, आथूणो, कुलियो, किलकटारी, टोल्डो, राखूंडो, घुचरियो, कूरियो, कूंपली, छारिंडी, हारी, उगसणी — इनके अलावा भी ऐसे कई शब्द हैं जो पिछले कई वर्षों से मैंने शहरी युवाओं से नहीं सुने। तो क्या अगले कुछ दशक बाद ये शब्द सिर्फ शब्दकोश तक सीमित रह जाएंगे?

यह सवाल हमें चौंका सकता है और इस पर अविश्वास भी जताया जा सकता है लेकिन यह भी एक हकीकत है कि पिछले पचास वर्षों में ही राजस्थानी के ऐसे कई शब्द हैं जो जो धीरे-धीरे इस्तेमाल से बाहर हो गए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बेहतर करियर की संभावनाओं के लिए अंग्रेजी का ज्ञान बहुत जरूरी है, लेकिन हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए।

भाषा, संस्कृति और विरासत हम सबकी जिम्मेदारी है। इसे सरकारों पर डालकर भूल जाना उचित नहीं है। हमारी संस्कृति हमें हर भाषा का आदर करना सिखाती है। ज्यादा भाषाएं सीखने के भी कई सकारात्मक पहलू हैं। इसका लाभ उस व्यक्ति के अलावा समाज और देश को भी मिलता है। इस बात को ध्यान में रखकर, हमें नई पीढ़ी को मातृभाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। पुरखों द्वारा संजोया गया शब्दों का यह खजाना कहीं हमारी उपेक्षा की वजह से ओझल न हो जाए।