प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

व्यक्ति को आशावादी तो होना ही चाहिए क्योंकि निराशाओं में डूबा व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता। उसकी तो हर गतिविधि थम जाती है, जीवन भी ठहर सा जाता है क्योंकि हर पल, हर क्षण, हर क्रिया में उसे निराशा दिखाई देती है। निराशाओं से घिरा ऐसा मानव पुतला न स्वयं सुख से रह सकता है और न उस शख्स को सुख से रहने देता है जिसके साथ रोज उसका उठना-बैठना होता है। परन्तु इसका मतलब यह भी नहीं कि सब कुछ आशाओं के सहारे ही छोड़ दिया जाए।

बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि हर चीज की एक सीमा होनी चाहिए, चाहे वह कुछ भी क्यों न हो। हम केवल आशा लगाए बैठे रहें और लक्ष्य प्राप्ति के लिए आवश्यक प्रयास भी न करें तो ऐसी आशा कभी पूर्ण नहीं होती। बहुत सी बार तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता। इसलिए यह गारंटी भी नहीं दी जा सकती कि श्रम करने से तो वह सब मिल ही जाएगा, जिसकी आस लगाए बैठे होते हैं। निर्भर करता है कि हमने कैसी आशाएं पाल रखी हैं। हम आशावादी हों परन्तु ऐसी आशा भी काम की नहीं जिसका कोई ओर-छोर नहीं दिखाई दे और हम केवल स्वप्नों का महल खड़ा करते जाएं।

मेरे एक मित्र ने एक बहुत अच्छा दृष्टांत सुनाया। दो गधे थे। दोनों आपस में अच्छे मित्र थे। साथ-साथ एक ही गांव में रहते थे। दोनों को अलग-अलग काम मिल गया। एक को किसी धोबी ने काम पर रख लिया। वह गधा रोज अपनी पीठ पर कपड़े ढोकर धोबीघाट ले जाता और शाम को धुलने के बाद वापस ढोकर घर ले आता। बीच के समय में धोबी घाट के आसपास घास चरता रहता। मजे में जिंदगी कट रही थी। दूसरा गधा एक नट (करतब दिखाने वाला) के साथ चला गया। नट जहां जहां करतब दिखाने जाता, उस गधे को साथ लेकर जाता क्योंकि सामान उसी पर लाद कर जाना पड़ता। वह गधा शरीर से थोड़ा कमजोर होता जा रहा था। दोनों गधे काफी दिनों बाद एक बार फिर आपस में मिले तो धोबी का गधा अपने मित्र गधे को देखकर बोला, अरे तुम इतने पतले कैसे हो गए हो, क्या खाने-पीने को ठीक से नहीं मिलता या कोई चिंता सता रही है? मुझे देखो, मैं तो पहले से भी ज्यादा मोटा हो गया हूं।

जो गधा नट के पास काम करता था उसको यह कथन अच्छा नहीं लगा। उसने नाराजगी भरे स्वर में उसे चिढ़ाते हुए कहा, तुम तो केवल खा-खा कर मोटे ही हो रहे हो परन्तु तुम्हारे काम में भविष्य क्या है, तुम्हारा फ्यूचर तो कुछ नहीं है। तुम्हें मिलने वाला क्या है, जबकि एक दिन मेरी तो लॉटरी लगने वाली है। मैं ज्यादा सुखी हूं, भले ही दिखने में पतला दिखता हूं।

धोेबी वाले गधे को थोड़ी ईर्ष्या हुई। उसने आश्चर्य प्रकट करते हुए बात का खुलासा करना चाहा। वह जानना चाहता था कि उस गधे को क्या मिलने वाला है जो लॉटरी निकलनेे की बात कर रहा है। उसने पूछ ही लिया तो नट वाले गधे ने कहा, मेरा मालिक नट रोज जगह-जगह खेल दिखाता है, जहां रस्सी पर उसकी लड़की संतुलन बनाकर चलती है और वह ढोल बजाता है। वह दर्शकों के सामने रोज कहता है अपनी लड़की को, कि देख छोकरी रस्सी पर ठीक से चलना, यदि गिर गई तो इस गधे से तुम्हारी शादी कर दूंगा। मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब वह रस्सी से गिरेगी। कभी न कभी तो छोकरी का बैलेन्स बिगड़ेगा ही, और वह गिरेगी ही। गिरेगी तो मुझसे उसकी शादी हो जाएगी। यह किसी लॉटरी से कम थोड़े ही है।

उस गधे का धैर्य तो देखिए। वह लड़की खेल दिखाते-दिखाते सात से सतरह वर्ष की हो गई है परन्तु गधे को अभी भी पूरी आशा है कि वह गिरेगी। ऐसी आशा क्या काम की? बिना सिर पैर की आशाएं ऐसी ही होती हैं। वह तो गधा था, आजकल तो आदमी भी ऐसे मिल जाएंगे जो असंभव सी आशाएं पाले रहते हैं। उन्हें मिलने वाला कुछ नहीं है। ऐसे लोगों को निराशा के अलावा कुछ हाथ लगने वाला नहीं। कोई अपने प्रेम को पाने की आशा में है तो कोई पद का आकांक्षी किसी संस्था का अध्यक्ष बनने की आशा किए बैठा है। कोई किसी राष्ट्रीय संगठन के ऊंचे पद की आशा में है, कोई राजनीति में किसी प्रमुख पद के सपने संजोए है। कोई बिना सेवा कार्य किए सबसे बड़े समाज सेवी बनने का गौरव पाने की आशा पाले हुए है तो कोई कुछ और आस लगाए बैठा है।

दरअसल हम आशा और आकांक्षा में भेद नहीं करते हैं। जबकि दोनों में काफी अंतर है। आपने कोई लक्ष्य तय किया, उसे पाने के लिए मन में एक विश्वास निर्मित करने की कोशिश की, वह आशा है। जबकि आपकी इच्छाएं, अभिलाषाएं आदि आकांक्षा की श्रेणी में आती हैं। आकांक्षा के पर लगे होते हैं, वह कल्पना की उड़ान पर उड़ सकती है। जो असंभव हो उसको भी पाने की सोच सकती है जबकि आशा का आशय अलग होता है। प्यार, पद, पैसा और प्रतिष्ठा यह सब कुछ, या इनमें से कुछ भी पाने की अभिलाषा हो, लोग बोलचाल की भाषा में इसे आस लगाए बैठना कह देते हैं। जबकि यह इच्छा है, आकांक्षा है। आदमी यदि कुछ पाने के लिए अथक प्रयास करता है और आशाएं भी ऐसी पालता है जो व्यावहारिक हों, श्रम करके जिन्हें पूरा किया जा सकता है तथा कुछ हद तक भाग्य या आशा के भरोसे रहता है तो उसकी विचारधारा को लोग लाजमी कहेंगे।

परन्तु कोई असंभव सी आशा-आकांक्षा पाले रखे और खुद में उसको पूरा करने का माद्दा न हो तो उस व्यक्ति की हालत उस नट के गधे जैसी ही होती है। कोई व्यक्ति आसमान में कील ठोकने की आकांक्षा पाले रखे, और भगवान से आस लगाए बैठा रहे तो ऐसे व्यक्ति की आशा भगवान कभी पूरी भी करेगा, कहा नहीं जा सकता। कहते हैं, आकांक्षा भी ऐसी पालनी चाहिए जो देर-सबरे पूरी होने की कम से कम धुंधली सी संभावना तो हो।

आशा के बारे में रचनाकारों का अलग अलग नजरिया हो सकता है परन्तु शब्दों में अपने विचारों और अनुभवों को रचनाकर कितनी संजीदगी से व्यक्त करता है, यह देखा जा सकता है सत्यपाल नांगिया की एक गजल के इन चंद शेरों में-

सपनों का इक रंग महल है, आशाओं की सीढ़ी,
वहां प्रेम की सेज बिछी है, जी चाहो तो सो लो।

प्रेम न हो तो चैन नहीं है, हो तो कष्ट बहुत हैं,
इधर कुआं है, उधर है खाई, ये लो चाहे वो लो।

चांद से चेहरों पे मत जाओ, इनके दिल पत्थर हैं
चांद से केवल पत्थर लेकर, लौटा यहां अपोलो।

इस दनिया में सुख, सुविधा, सुन्दरता सब नश्वर है,
हुस्न के अंधो, काल का हाथी, अच्छी तरह टटोलो।