जलवायु के प्रति जागरूकता

जलवायु परिवर्तन के कारण विश्व के तापमान में लगातार वृद्धि और मौसम में भी अनिश्चितता के कारण इस समस्या पर बार-बार विचार किया जाता है। भारत में भी जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आठ मिशन बनाए, लगभग दस साल हो चुके हैं परंतु इनकी सफलता पर अभी भी सवाल उठाये जा सकते हैं। इन मिशनों के लिए आवंटित धन राशि का भी ठीक से उपयोग नहीं हो रहा है और साथ ही इनके बारे में जनता के समक्ष आवश्यक जागरुकता भी नहीं है ऐसे में सरकार द्वारा जलवायु परिवर्तन में सुधार लाने की कोशिश में सफलता नहीं मिल सकती क्योंकि जब तक आम जनता इसके बारे में गंभीर नहीं होगी तब तक यह महज सरकारी कागजों में ही फंसकर रह जाएगी। आठ राष्ट्रीय मिशनों के जरिए सरकार की कोशिश थी कि चौतरफा विकास के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की समस्याओं के सुलझाने के तरीके ढूंढनेे की आवश्यकता को पूरा किया जा सके। इसके लिए सभी राज्यों को अपने इलाकों में जलवायु परिवर्तन से जूझने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार करना था। जनता के बीच इन मिशनों को ले जाना था लेकिन जागरूकता के अभाव के कारण यह मिशन बेकार ही साबित हो रहे हैं। सरकार ने इनके सफल क्रियान्वयन के लिए काफी ब़डी धनराशि प्रति वर्ष खर्च करना का फैसला किया था परंतु सच तो यह है अधिकांश क्षेत्रों में इन मिशन के लिए आवंटित राशि ज्यों की त्यों ही प़डी रह गयी है। ऐसे में यह भी सवाल उठता है कि मिशनों के क्रियान्वयन का जिम्मा किसका था। अगर पिछले नौ वर्षों में इन पर काम हुआ होता तो निश्चित रूप से आज देश में जलवायु परिवर्तन की समस्या कोलेकर बेहतर नीति तैयार हो चुकी होती। सच तो यह है कि ऐसी लापरवाही के खिलाफ सरकार को सख्त कार्यवाही करनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी सजा भी मिलनी चाहिए। ऐसे ब़डी योजनाओं को अगर ठन्डे बस्ते में डाल दिया जाता है तो यह समझना भी मुश्किल ही है कि सरकार छोटी योजनों को किस तरह से अंजाम तक पहुंचा पाती है। भारत में मानसून पर निर्भरता इस बात का सुबूत है कि अगर जल्द जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना नहीं किया गया तो परिणाम बुरा होगा। देश में अलग-अलग जगहों पर किसान आंदोलन चल रहे हैं और सरकार को इन आंदोलनों की मूल वजह समझने की जरूरत है। अच्छी फसल का सीधा रिश्ता बेहतर जलवायु पर्यावरण से ही होता है। समय रहते सरकार को अपनी इस कोशिश को फिर एक नई शुरुआत देने की जरूरत है। राज्य सरकारों को भी बेहतर भागीदारी के साथ इन मिशनों से जु़डने की जरूरत है। जनता के बीच सरकार को जागरुकता ब़ढाने के साथ ही जनता को साथ जो़डने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन से निपटना आसान नहीं होगा और इसके लिए पारंपरिक बीजों के अनुरक्षण, कार्य-योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन, कृषि क्षेत्र में स्थानीय ज्ञान व आधुनिक तकनीक का उपयोग जैसे मुद्दों पर विचार किए जाने के साथ ही एक मजबूत रणनीति बनाने की आवश्यकता है। अगर देश में जल्द ही जलवायु नीति को ठोस रूप नहीं दिया जाता, तो इस समस्या का कोई भी समाधान ढूँ़ढ पाना संभव नहीं होगा।