सेना पर होते हमले

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जम्मू कश्मीर में पुनः एक सैन्य शिविर को निशाना बनाया गया। इस आतंकी हमले में हमने तीन सैनिकों को खो दिया। सेना में इस तरह से हो रही जान की हानि गंभीर विषय बन चुकी है। इस से पहले भी अनेक बार इसी तरह के आतंकी हमलों में हमारे सैनिक शहीद हुए हैं। बार-बार हो रहे ऐसे हमलों के खिलाफ हमारी सेना असहाय ऩजर आ रही है। गुरूवार हो हुए हमले में दो सैनिक और एक अफसर शहीद हुए हैं। हमारी सेना के शीर्ष अधिकारियों को अब यह समझना होगा की इस तरह के हमले भविष्य में भी हो सकते हैं और ऐसी स्थिति में हमारे सैनिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक योजना बनाने की जरूरत है। सच तो यह है की बार बार हो रहे इन हमलों में समान्तर तरीके से आतंकी हमला करते ऩजर आते हैं। वह या तो किसी सैन्य छावनी या शिविर पर हमला करते हैं या फिर किसी सैन्य काफिले को अपना निशाना बनाते हैं। कुपवा़डा में आतंकियों ने सैन्य शिविर पर धावा बोला और पहली दीवार को पार कर अंदर पहुँच गए। अब इस विषय पर जांच होने के बाद ही पता चल सकेगा की हमारी सुरक्षा प्रणाली में कहाँ ढील रह गई और किस स्तर पर हुई गलती के कारण हमारे तीन सैनिकों ने जान गवांई। जम्मू कश्मीर में सेना के सामने युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। सेना एवं सुरक्षा बलों के ठिकानों पर हमले का जोखिम बना ही रहता है। इन स्थितियों में तो सुरक्षा के प्रबंध ऐसे होने चाहिए कि आतंकियों को कहीं कोई मौका न मिले। यह सही है कि जान देने और लेने पर तुले आतंकियों को रोक पाना एक कठिन काम है, लेकिन सुरक्षा में किसी भी तरह की भूल को ऩजर अंदा़ज नहीं करना चाहिए । आतंकी सीमा पार पाकिस्तान से आए थे। इसकी आशंका इसलिए है, क्योंकि हमले का शिकार बना सैन्य शिविर नियंत्रण रेखा से कुछ ही दूरी पर है। मारे गए आतंकियों के पास से बरामद हथियार एवं अन्य सामग्री भी यही बता रही है कि उन्हें पाकिस्तान से भेजा गया था। सरकार और सेना को इस पर विचार करना ही होगा कि आखिर आतंकियों को सीमा में प्रवेश करने से क्यों नहीं रोका जा पा रहा है? यह चिंताजनक है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाना तो दूर रहा, सीमा को अभेद्य बनाने में भी सफलता नहीं मिल पा रही है। कश्मीर में जैसे हालात हैं उन्हें देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि आतंकी हमलों से आए दिन दो-चार हो रहे जवानों को हर हाल में सुरक्षित बनाने के पुख्ता प्रबंध किए जाएं्। इन प्रमुख समस्याओं के अलावा पत्थरबाजों से निपटने के लिए भी कोई कारगर रणनीति बनानी आवश्यक है, क्योंकि अब ऐसी घटनाएं ब़ढ रही हैं जिनमें आतंकियों से लोहा ले रहे जवानों को पत्थरबाजों का भी सामना करना प़डता है। दुर्भाग्य से कुपवा़डा में भी यही हुआ्। यह समझना कठिन है कि जब सेनाध्यक्ष भी यह मान रहे हैं कि पत्थरबाज आतंकियों के मददगार हैं तब फिर देश का राजनीतिक नेतृत्व इसी बात को एक स्वर से दोहरा क्यों नहीं पा रहा है? इससे ब़डी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि आतंकियों के मददगार पत्थरबाजों की निंदा-आलोचना करने के बजाय सेना और सुरक्षा बलों को नसीहत-हिदायत देने का काम किया जा रहा है।