संपादकीय: चीन को स्पष्ट संदेश

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

पड़ोसी देश चीन को विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह संदेश कि ‘यदि आप अपना (मित्रता का) हाथ बढ़ाते हैं, तो हम भी हाथ बढ़ाएंगे, लेकिन अगर आप हम पर बंदूक तानते हैं, तो हम भी ऐसा ही करेंगे’ — संतुलित एवं सर्वथा उचित है। चीन के साथ संबंधों को लेकर भारत की नीति क्या होनी चाहिए, यह इसका स्पष्ट विवरण है। भारत का जवाब ऐसा ही है। उसने चीन के साथ अतीत की कड़वाहटों को एक तरफ रखकर संबंध सुधारने को वरीयता दी है। अगर भारत और चीन के संबंधों में मधुरता होगी, तो इसका लाभ किसे होगा? निश्चित रूप से दोनों देशों को।

हम ​दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं, यहां एक बड़ा बाज़ार है, दोनों देशों की संस्कृति अत्यंत प्राचीन है, दोनों के ही सामने गरीबी, बेरोजगारी जैसी चुनौतियां हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन ने गरीबी निवारण और तकनीक के क्षेत्र में बहुत उपलब्धि हासिल की है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार विशाल है। भारत भी तेजी से उभर रहा है। अगर दोनों देशों में सहयोग बढ़ेगा तो यहां की जनता खुशहाल होगी। भारत इस बात को समझता है। इसलिए चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर हमेशा जोर दिया। चीन ने भारत की मित्रता, विनम्रता, सज्जनता को कमजोरी समझने की भूल की।

वह इस ग़लतफ़हमी में था कि जिस प्रकार अतीत की सरकारों को आंखें दिखाता रहा, वही रंग-ढंग इस बार भी काम कर जाएगा। यह दांव काम नहीं आया। गलवान घाटी में पूरी दुनिया ने देखा कि किस प्रकार भारतीय सेना के जवानों ने चीनियों के छक्के छुड़ा दिए। यह तो भारतीय जवानों पर धोखे से किया गया हमला था। अगर उन्हें ललकार कर मुठभेड़ करते तो चीनियों को और अच्छा सबक मिलता। वैसे जो सबक हमारे जवानों ने दिया, वह भी जोरदार था। चीन को अपने हताहत जवानों का नाम लेने में ही कई महीने लग गए; और जब अपने नुकसान को स्वीकारा तो गलत संख्या बताई।

गलवान के बाद चीनी मुखपत्र धमकियां देते रहे। भारत सरकार ने उन्हें रद्दी के एक टुकड़े से ज्यादा अहमियत नहीं दी। शी जिनपिंग अपनी महानायक की छवि गढ़ने के लिए एलएसी पर जवानों की संख्या बढ़ाते रहे। उसके जवाब में भारतीय जवान सीना तानकर खड़े थे, उन्होंने कई महत्वपूर्ण चोटियां कब्जा ली थीं। चीनियों की हिम्मत नहीं हुई कि आगे बढ़ सकें।

चीन ने यह दांव इसलिए चला था ताकि कोरोना महामारी से कमजोर हो रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में एक शक्ति प्रदर्शन किया जाए। चूंकि भारत एक आर्थिक, सैन्य महाशक्ति है, उसके पड़ोस में स्थित है, पश्चिमी देशों सहित दुनिया में सकारात्मक छवि रखता है, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है; लिहाजा चीन भारत के साथ टकराव मोल लेकर पूरी दुनिया को दिखाना चाहता था कि कोई हमसे टकराने की भूल न करे, हम किसी के काबू में आने वाले नहीं हैं। लेकिन भारत ने सही समय देखकर इस ड्रैगन को नाथ डाल दी। साथ ही कुछ जोरदार चाबुक लगा दिए। चीन की अकड़ ढीली हो गई।

चीनी जवान जिस धूमधाम से एलएसी पर आए थे, यहां की सर्दियों के साथ भारतीय जवानों ने उनका ‘स्वागत’ जिस ‘गर्मजोशी’ से किया, इसकी उनके मन में कोई कल्पना नहीं रही होगी। सर्दियों ने तो उनका बहुत बुरा हाल कर दिया था। चीनी जवान ऐसे सख्त के माहौल में रहने के अभ्यस्त नहीं थे। इसलिए जब सैन्य वार्ता के दौरान बनी सहमति पर अमल करने की बात आई तो फौरन यह इलाका छोड़कर फुर्र होना चाहते थे। सभी को हैरानी थी कि जब भागने की इतनी जल्दी थी तो यहां आए ही क्यों!

दरअसल ची​नी जवानों को यह एक सुनहरा अवसर लगा जिससे वे पीछे हटकर अपने देश में डींगें हांक सकते थे, साथ ही एलएसी पर बने तनावपूर्ण हालात से खुद को बचा सकते थे। इससे भारत सरकार ने दुनिया को समझा दिया कि चीन को इसी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। यही वह भाषा है जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को समझ में आती है। अगर ये अहिंसा, सत्य, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, अनाक्रमण, संप्रभुता का सम्मान जैसे आदर्शों से परिचित होते तो न तिब्बत पर अवैध कब्जा करते और न भारत पर धोखे से हमला करते।

भारत सरकार की कार्रवाई से इस बात को बल मिलता है कि चीनी नेतृत्व का आदर्शों से कोई लेनादेना नहीं है। यह विस्तारवादी मानसिकता रखता है और हर चीज पर निरंकुश प्रभुत्व चाहता है। इस​के प्रत्युत्तर के लिए वही तरीका श्रेष्ठ है जो मोदी सरकार ने अपनाया। बेशक भारत मित्रता चाहता है, लेकिन चीन को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह उसके किसी दबाव में आ जाएगा। अगर चीन हमारी ओर बंदूक तानेगा तो भारत भी यही करेगा और इसका पूरा अधिकार रखता है।